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जलने से पहले जलना छोड़ दें: मुनिश्री

7 वर्ष पहले
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कार्यालय संवाददाता | आष्टा/खाचरोद

व्यक्तिको जो सुनाई पड़ रहा है वह दिख नहीं रहा है और जो दिख रहा है वह सुनाई नहीं दे रहा है। देह के अंदर परमात्मा है, लेकिन देह परमात्मा नहीं है। जब तक आत्मा हम सभी के बीच में थी तो तीर्थंकर को बालक सहित अनेक रूप में देखा। प्रभु के चरणों में दास बनने नहीं परमात्मा बनने के लिए जाए उसी का नाम परमात्मा है।

यह बातें अलीपुर भगवान आदिनाथ पंचकल्याणक प्रतिष्ठा गजरथ महोत्सव के अंतिम दिन आचार्य प्रवर विशुद्ध सागर महाराज ने कहीं। उन्होंने कहा कि जलने से पहले जलना छोड़ दो, देह में आग लगे उसके पहले मन में जो कषायरूपी दैत्य है उसे त्यागे। व्यक्ति मंदिर में पोछा लगाता है तो वह यह समझे कि अपने पापों को पोछ रहा है, मंदिर तो स्वत: ही साफ रहता है।

युवा पीढ़ी साधुओं के पीछे क्यों- आचार्यश्री ने कहा कि आज की यह पीढ़ी धर्म से जुड़कर अपना कल्याण चाहती है। अज्ञानी हर क्रिया पुण्य के लिए करता है। अज्ञानी जीव पुण्य के लिए धर्म करता है। ज्ञानी व्यक्ति पाप से बचने के लिए पुण्य करता है। यह भारत देश कैसे बर्बाद हो गया इसका प्रमुख कारण चुगलखोरी करना बताया। मुनिश्री ने कहा कि नारदजी और माता मंदिरा अगर चुपचाप बैठ जाते तो यह स्थिति नहीं होती। उन्होंने चुगलखोरों को मच्छरों से भी बड़ा महापापी बताते हुए कहा कि मच्छर तो अपनी गुनगुन करते आते हैं, जबकि चुगलखोर चुपचाप चुगली करके चले जाते हैं।

ज्ञानियोंको आदेश दिया जाता है

विकासखंडके गांव खाचरोद के दिगंबर जैन मंदिर में भी प्रवचन का आयोजन हुआ। इसमें विशुद्ध सागर महाराज ने कहा कि ज्ञानियों को आदेश दिया जाता है, त्रियंचों को छड़ी मारी जाती है। जैन दर्शन में मृत्यु को महोत्सव के रुप में मनाते हैं, जबकि दुनिया में अन्य मृत्यु पर शोक मनाते हैं। भारत पूरे विश्व का नेतृत्व कर सकता है, आवश्यकता है हम अपनी बातों को दबंगता के साथ रखें। मुनिश्री ने कहा कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की पहचान राम से ज्यादा रावण ने कराई। रावण नहीं होता तो रामायण ही नहीं बनती। रावण ने माता सीता का हरण कर जो पाप किया उसका परिणाम अभी भी भुगतना पड़ रहा है। कार्यक्रम में सभी समाज के श्रद्धालुओं ने भाग लिया। इस अवसर पर अखिलेश जैन, संतोष कुमार जैन, सुनिल कुमार जैन, राजेश कुमार जैन आदि थे।

आष्टा. खाचरोद के दिगंबर जैन मंदिर में प्रवचन देते हुए मुनिश