पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें
  • Hindi News
  • पशु चिकित्सालय में नहीं मिल रहा समुचित इलाज

पशु चिकित्सालय में नहीं मिल रहा समुचित इलाज

7 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
नगरसहित आसपास के पचासों गांवों के पशुओं के उपचार के लिए 1956 से शुरू हुए पशु चिकित्सालय में बदहाली का आलम है। टूटे-फूटे चिकित्सालय में इलाज के लिए आए पशुओं के और ज्यादा बीमार हो जाने की आशंका बनी रहती है।

डॉक्टरों, दवाइयों और साफ-सफाई का यहां अभाव है। कृषि प्रधान इस इलाके में पशु धन की भी बहुलता है। गाय, भैंस और बकरियां यहां बड़ी संख्या में हैं, जो खेती में रासायनिक पदार्थों के बहुत अधिक इस्तेमाल के कारण नई-नई बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। इसके अलावा राष्ट्रीय राजमार्ग पर रात-दिन बैठे रहने वाले पशु प्रतिदिन दुर्घटनाओं का शिकार होते हैं। इन सभी के उपचार के लिए एकमात्र इसी पशु चिकित्सालय का सहारा है।

नहींसुधरी भवन की हालत : पशुचिकित्सालय भवन की जर्जर हालत को देखते हुए एक साल से भी पहले करीब बारह लाख रुपए मरम्मत के लिए स्वीकृत हुए थे। इतना समय बीत जाने के बाद भी अभी तक यह इस हालत में नहीं है कि स्टाफ अंदर बैठ सके अथवा दवाइयां रखी जा सकें। गैलरी में स्टाफ बैठता है और खुले मैदान में अथवा 55 साल पहले बने टपरेनुमा गंदगी भरे स्थान में पशुओं का इलाज होता है। भूसे से पानी तक इल्लियां और कीड़े-मकोड़े देखे जा सकते हैं। दवाइयां और रिकाॅर्ड एक क्षतिग्रस्त कमरे में एक साथ रखा हुआ है।

नहींलेता स्टाफ रुचि : सेमरीके नीरजकुमार ने बताया कि अस्पताल में इलाज के लिए पशु लाने पर स्टाफ इलाज में रुचि नहीं लेता है। इसी तरह नगर के गौ सेवक किसी तरह दुर्घटनाग्रस्त पशुओं को यहां इलाज के लिए लाते हैं तो कोई नहीं मिलता। गौ सेवक जितेंद्र पटवा कहते हैं कि किसी के मिलने की कई बार शिकायत कर चुके, लेकिन कोई सुधार नहीं रहा है। वास्तव में बाहरी लोगों के बल पर ही यहां पशुओं का उपचार होता है। पशु चिकित्सालय में मौजूद दरयाबसिंह, पप्पू धाकड़ और गजेंद्र धाकड़ आदि कहते हैं कि सभी व्यवस्थाएं लोगों के सहयोग से ही चल रही हैं।

किसी को नहीं परवाह

^पशुओंके उपचार के समय कई बार मैं पहुंचता हूं। यहां अव्यवस्थाओं के कारण ठीक से उपचार नहीं हो पाता और ऐसा लगता है कि किसी को परवाह नहीं है। अस्पताल प्रबंधन द्वारा उपलब्ध सुविधाओं के बारे में जानकारी नहीं दी जाती और लोग लाभ से वंचित हो जाते हैं। जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों और अन्य लोगों को भी इस बारे में रुचि लेकर व्यवस्थाएं सुधारनी चाहिए। अंकिततिवारी, सामाजिकका