बर्बाद फसल ने बनाया कर्जदार
इसअंचल में ब्याज दर इतनी ज्यादा है कि पांच से दस महीने के बीच ही रकम दोगुनी हो जाती है। चना की फसल बर्बाद होने और धान के लागत से भी कम भाव रहने के कारण यह स्थिति बनी है। अवैध रूप से सूदखोरी करने वालों के लिए यहां की थमी हुई अर्थव्यवस्था इतनी ज्यादा रास रही है कि इनकी तादाद लगातार बढ़ रही है। अब पुलिस इन पर नकेल कसने पर आमादा है।
कृषि पर आधारित अर्थव्यवस्था वाले इस अंचल में लगातार दूसरी बार किसानों को फसल ने दगा दे दिया है। इसका असर सभी कारोबारों पर हुआ है और अभी तक बाजार में नकद रुपए की तंगी बनी हुई है। छोटे किसान फसल की तैयारी के लिए और छोटे कारोबारी अपने कारोबार का चक्र चलाए रखने के लिए थोड़े समय के लिए ऊंची ब्याज दर पर भी रकम की व्यवस्था जुटा लेते हैं। इस बार बाजार में अभी भी ठंडापन बना हुआ है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि लोगों को अभी भी पूंजी जुटानी पड़ रही है और सूदखोरों को भरपूर कमाई का मौका मिल रहा है।
मामला : दो
किराएपर चारपहिया वाहन चलाने वाले दुर्गेश सिंह ने किश्त चुकाने के लिए दस हजार रुपए उधार ले लिए। जमानत के तौर पर उन्होंने दूसरी गाड़ी के कागजात दे रखे थे। छह महीने से ज्यादा समय से वे दो हजार रुपए महीने का ब्याज दे रहे हैं। यानि बारह हजार रुपए चुकाने के बाद भी उन पर बकाया कम होने का नाम नहीं ले रहा है। अब मामला पुलिस की जानकारी में है।
मामला : एक
कपड़ोंकी दुकान करने वाले मनोजकुमार ने अपनी वसूली हो पाने के कारण मकान की रजिस्ट्री रखकर दो लाख रुपए उधार लिए। छह महीने से वह पचास हजार रुपए महीने चुका रहे हैं, लेकिन तीन लाख रुपए देने के बाद भी मूल रकम दो लाख रुपए बकाया ही है। घबराकर उन्होंने पुलिस को पूरे मामले ही जानकारी देकर छुटकारे और संरक्षण की गुहार लगाई है।
ब्लेंक चेक से रजिस्ट्री तक
पुलिसके पास पहुंचे कुछ मामलों से खुलासा हुआ है कि सूदखोर ब्लेंक चेक, कोरे स्टांप, मकान-प्लाट की रजिस्ट्री और वाहनों के दस्तावेज भी रख लेते हैं। इनकी कीमत दी गई रकम से बहुत ज्यादा होती है। इस तरह कर्जदार का कानूनी पक्ष बहुत कमजोर हो जाता है।
दादागिरीसे वसूली
पुलिसको बताया गया है कि सूदखोर वसूली के लिए दादागिरी का सहारा लेते हैं। कुछ लोग खुद और कुछ लोग अन्य को भेजकर कर्जदार को धमकाते हैं। डर के कारण कर्जदार ली गई रकम से कई गुना ज्यादा रकम वापस कर देता