फटकार के बाद हुआ इलाज
रक्त के लिए भटकती हैं प्रसूताएं
मंडीदीप|औद्योगिक नगरके सरकारी अस्पताल में आबादी के लिहाज से तो अस्पताल भवन है,न स्टाफ और जरूरी संसाधन ही उपलब्ध हैं। इससे यहां मरीजों को मूलभूत सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। इस सीएचसी स्तर के स्वास्थ्य केंद्र से नगर सहित आसपास के 62 गांवों की आबादी जुड़ी हुई है, जहां से सामान्य रोगों के साथ बड़ी संख्या में प्रसव के मामले भी पहुंचते हैं।
खास बात यह है कि इन प्रसूताओं को प्रसव के पूर्व और बाद में रक्त की जरूरत पड़ती है,लेकिन अस्पताल मेंं ब्लड बैंक की सुविधा नहीं होने से इसका खामियाजा मरीजों और उनके परिजनों को भुगतना पड़ रहा है। हर रोज अस्पताल में करीब सात से दस डिलीवरी होती हैं। इसमें पांच से अधिक महिलाओं को रक्त चढ़ाना पड़ रहा है, तब जाकर महिला चिकित्सक गर्भवती को सुरक्षित प्रसव करा पाती हैं। औद्योगिक नगरी में ब्लड बैंक की सुविधा होने से राजधानी के अस्पतालों पर निर्भर रहना पड़ता है। इस वजह से कई बार तो अस्पताल प्रबंधन प्रसूताओं मरीजों को इमरजेंसी की स्थिति में भोपाल के सुल्तानिया या अन्य अस्पतालों में रेफर कर देता है, जिससे मरीज उनके परिजनों को खून के लिए इधर-उधर भटकना पड़ता है।
प्रस्तावपड़ा ठंडे बस्ते में : बीती28 जुलाई को संयुक्त संचालक स्वास्थ्य डॉ. एसके जांगड़े ने स्वास्थ्य केंद्र का दौरा किया था। इस दौरान उन्होंने केंद्र के सिविल अस्पताल की जरूरत को जाना था। इसके साथ ही उन्होंने सीजेरियन ऑपरेशन की संख्या बढ़ाने एवं ब्लड स्टोरेज यूनिट शुरू करने के निर्देश अस्पताल प्रबंधन को दिए थे,लेकिन अस्पताल प्रबंधन ने इस दिशा में अब तक कोई कारगर कदम नहीं उठाया। इसका खामियाजा नगर की जनता को भुगतना पड़ रहा है।
कब पूरी होगी मांग
श्रमिकनेता दृगचंद प्रजापति का कहना है कि बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं पाने के लिए लंबे समय से यहां सिविल हॉस्पिटल की मांग की जा रही है। इसको लेकर क्षेत्रीय विधायक प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति राज्यमंत्री सुरेंद्र पटवा भी कई बार इस सीएचसी सेंटर को सिविल हॉस्पिटल बनाने की घोषणा कर चुके हैं,मगर अब तक इस ओर कोई कार्रवाई नहीं की गई। इससे गरीब एवं वंचित वर्ग के लोगों को निजी और महंगे अस्पतालों का सहारा लेने को मजबूर होना पड़ रहा है।
निरीक्षण के बाद शुरू होगा काम
^प्रोजेक्टकंट्रोलर काे प्रस्ताव भेजा है। उनके द्वारा न