झापल की अनिता इंग्लैंड से करेगी पीएचडी
{रहने-खानेका खर्चा करीब 10 हजार अमेरिकी डॉलर।
{आकस्मिक भत्ता एक हजार अमेरिकी डॉलर।
{उपकरण भत्ता 1500 भारतीय मुद्रा।
{प्रवेश शुल्क, शिक्षण शुल्क, बीमा प्रीमियम, एयर टिकट, वीजा शुल्क आदि।
माता-पिता के साथ अनिता।
अमिताभ बुधौलिया| भोपाल/बैतूल
कुछअसंभव है नहीं; बस थोड़ी आग दिल में चाहिए। ऐसी ही आग है बैतूल जिले में मौजूद एक आदिवासी बाहुल्य गांव झापल की रहने वाली अनिता बारस्कर के मन में। गाय-बैल चराने वाली अनिता का चयन मप्र सरकार की आदिवासी विदेश अध्ययन योजना के अंतर्गत हुआ है। यानी अनिता अब इंग्लैंड से न्यूक्लियर इंजीनियरिंग में पीएचडी करेंगी।
12किमी पैदल जाती थीं पढ़ने
अनीताबताती हैं, \\\"मैं तो जंगल में गाय-बैल चराने जाती थी। हमारे गांव के स्कूल के मास्टर मन्नूलाल ने कहा कि तुम पढ़ाई करो। तब मुझे 6 किमी दूर गोहटी गांव में पढ़ने जाना पड़ा। 5 वीं तक वहां पढ़ी। इसके बाद 8वीं की पढ़ाई अपने ही गांव से पूरी की। लेकिन 9वीं की पढ़ाई के लिए फिर 12 किमी दूर रतनपुर गांव जाना पड़ा। वहां से 10 वीं पास की। 11 और 12वीं हरदा जिले के टिमरनी कस्बे के स्कूल से पास की।\\\' अनिता बताती हैं, मैं जब हरदा के सरकारी कॉलेज से बीएससी और एमएससी(केमिस्ट्री) की पढ़ाई कर रही थी, तब अपना खर्चा उठाने के लिए समय निकालकर खेतों में काम भी करती थी।\\\' अनिता ने बीएससी 67 प्रतिशत और एमएससी 64 प्रतिशत अंकों के साथ पास किया।
परिवारमें सभी अनपढ़
अनिताके पिता सम्मू विकलांग हैं। मां पुताई खेतों में मजदूरी करती है। अनिता के अलावा उसके दो भाई और तीन बहनें और हैं। अनिता इनमें सबसे छोटी है। इस परिवार को सभी लोग अनपढ़ हैं। अनिता के अलावा गांव में भी कोई उच्च शिक्षा हासिल नहीं कर पाया है। फिलहाल अनिता अपने गांव के बच्चों को ट्यूशन देती हैं, ताकि घरवालों की कुछ आर्थिक मदद हो सके।
ऐसेमिला प्रोत्साहन
अनिताबताती हैं, \\\'एक दिन हमारे प्रोफेसर देवेंद्र रोडगे ने दैनिक भास्कर में पढ़ा कि आदिवासी विभाग की तरफ से विदेश जाने के लिए स्कॉलरशिप निकली है। उन्होंने मुझसे कहा कि, मैं फार्म भर दूं। मैंने 30 सितंबर को फार्म भरा और 22 नवंबर को मंत्रालय में इंटरव्यू हुआ। अगले दिन मालूम चला कि मेरा सिलेक्शन हो गया है। मैं हरदा में हॉस्टल में रहकर अंग्रेजी की कोचिंग कर रही हूं। अनिता बताती हैं, मैंने सोचा था कि मैं