दो दिन रही थी छुट्टी, 13 दिन तक रहा था राजकीय शोक
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 1942 में बनारस विश्वविद्यालय में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से मुलाकात हुई थी। आंदोलन के सक्रिय होने पर विश्वविद्यालय में छुट्टियां घोषित कर दी। घर आए तो यहां पुलिस वारंट लेकर तलाश कर रही थी। प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री लीलाधर जोशी के साथ शुजालपुर में अज्ञातवास बिताया। आंदोलन थमने के बाद विश्वविद्यालय में पढ़ाई पूरी कर राजगढ़ स्टेट में उद्योग स्थापित करने असिस्टेंट चीफ कस्टम एवं एक्साइज ऑफिसर के पद पर पोस्टिंग भी हो गई। 30 जनवरी 1948 को गांधी जी की हत्या के बाद उनके अंतिम दर्शन को मैं दिल्ली तो नहीं जा सका, लेकिन यह मेरा सौभाग्य रहा कि महात्मा के अस्थि कलश के दर्शन ब्यावरा में ही हो गए। यह बात बताते हुए 92 वर्षीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी उदित नारायण सक्सेना पुरानी बातों को याद कर भावुक हो गए। श्री सक्सेना ने बताया कि यह क्षेत्र का सौभाग्य रहा कि महात्मा के अंतिम दर्शन में शामिल नहीं होने वाले लोगों को क्षिप्रा में अस्थि विसर्जित यात्रा के दर्शन हो गए।
आज के दिन क्षिप्रा में विसर्जित हुए गांधी के फूल
राजगढ़ राज्य की पाक्षिक पत्रिका के अनुसार गांधी जी के फूल दिल्ली से लाकर क्षिप्रा में 12 फरवरी को विसर्जित किए थे। महात्मा जी के यह फूल 11 फरवरी 1948 को सुबह नौ बजे गुना से उज्जैन के लिए रवाना हुए थे। ग्वालियर स्टेट की मिलिट्री के साथ यह फूल सुबह पौने 11 बजे ब्यावरा पहुंचे। इसके लिए राजगढ़ राज्य से भी शाही बैंक व सेना के साथ दीवान और राज्याधिकारी फूल दर्शन के लिए पहुंचे। इन्होंने शोक सूचक काले पट्टे भी बांधे। केंटीन के पास फूल रखकर पुलिस व बैंड द्वारा गार्ड ऑफ आनर दिया गया।
13 दिन के राजकीय शोक
के साथ हुए थे आयोजन
गांधी जी की हत्या के बाद राजगढ़ राज्य में 13 दिन का शोक था। गांधी चौक पर 13 दिन तक शोकसभा करने के साथ ही गीतापाठ, भजन, कीर्तन के साथ सत्य, प्रेम और अहिंसा के लिए रोजाना पाठ पढ़ाया गया। नगर में 12 फरवरी को सुबह नौ बजे गांधी जी का विमान सजाकर शिवघाट पर कलश विसर्जन के लिए ले जाया गया था। जहां विकास मंत्री मदनलाल अग्रवाल के भाषण के बाद कलश विसर्जन कर हरिजन भोज का आयोजन किया गया था।
गांधी जी की कलश यात्रा की कहानी बताते उदित नारायण सक्सेना।
राजगढ़ राज्य की पाक्षिक पत्रिका में गांधी जी की अस्थि कलश यात्रा का है जिक्र।
यादें