केला फसल में बढ़ रहा करपा रोग का प्रकोप
बारिश के कारण मौसम में नमी गई है। इससे केला फसल में करपा बीमारी (सिंगाटोका पत्ती धब्बा रोग) का प्रकोप बढ़ रहा है। कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने ग्राम बंभाड़ा, दापोरा, पातोंडा, हतनूर, गवाना, लोनी सहित अन्य गांवों में भ्रमण कर केला फसल देखी। यहां फसलों पर करपा रोग के लक्षण दिखाई देने पर वैज्ञानिकों ने फसल बचाने के लिए किसानों को जरूरी सलाह दी। करपा बीमारी प्रबंधन के बारे में उन्हें समझाया गया।
कार्यक्रम समन्वयक और वरिष्ठ उद्यान वैज्ञानिक डॉ. अजीत सिंह ने बताया मौसम में बदलाव के कारण केले की पत्तियों की ऊपरी सतह पर शुरुआती दौर में पीले धब्बे बनना शुरू होते हैं। ये बाद में बड़े हो जाते हैं। ये धब्बे पत्ती के किनारे और आगे के भाग पर ज्यादा पाए जाते हैं। यह बीमारी बारिश, नमी और तापमान से प्रभावित होती है। मानसून के दौरान नमी ज्यादा होने और तापमान कम होने के कारण बीमारी का प्रकोप ज्यादा होता है। भ्रमण के दौरान वैज्ञानिक डॉ. जगन्नाथ पाठक, भूपेंद्र सिंह, मेघा विभूते, कार्तिकेय सिंह, मोनिका जायसवाल भी मौजूद थीं।
कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने विभिन्न गांवाें में केला फसल देखी।
बीमारी से फसल को बचाने के लिए पहला छिड़काव 1 ग्राम कार्बेन्डाजिम, 8 मिली बनोल ऑयल 1 लीटर पानी में घोल बनाकर अच्छी तरह से करें। पहले छिड़काव के 20-25 दिन बाद दूसरा छिड़काव 1 मिली प्रोपीकोनाजॉल, 8 मिली बनोल ऑयल 1 लीटर पानी की दर से छिड़काव करें। इसके बाद तीसरा छिड़काव 20-25 दिन बाद करें। इसमें मेनकोजेब (2 ग्राम) या ट्राइडमार्क (1 ग्राम) 1 लीटर का घोल बनाकर छिड़काव करें। इसके अलावा खेत में बीमारी से ग्रसित पत्ती और मुख्य फसल वाले पौधों से निकलने वाली पत्तियों को नियमित रूप से निकालते रहें। केले के बागों को खरपतवार से मुक्त रखें। पानी निकासी की व्यवस्था करें।
यह करें किसान
कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने किसानों को बताए रोग से बचाव के उपाय
खेती किसानी