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गृहस्थ एक तपोवन, इसमें सेवा, संयम की जरूरत

6 वर्ष पहले
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परिवारका निर्माण होता है तो समाज का निर्माण होता है। परिवार एक संस्था है। परिवार जैसा होगा वैसा ही व्यक्ति का निर्माण होगा। हम आस्था का निर्माण करें। गृहस्थाश्रम धन्य है। क्योंकि व्यक्ति का निर्माण यहां से शुरू होता है। गृहस्थ एक तपोवन है। इसमें सेवा, संयम और साधना की जरूरत है। सभी आश्रम गृहस्थ आश्रम पर ही निर्भर हैं।

संजय नगर स्थित गायत्री शक्तिपीठ में चल रही प्रज्ञा पुराण कथा के दूसरे दिन मंगलवार दोपहर 3 बजे डॉ. गोपी वल्लभ पाटीदार ने यह विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा हमारे हमारे यहां चार वेद, 18 पुराण हैं। परम पूज्य गुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा आचार्यजी ने 19वें पुराण की रचना की। इसमें कलयुग की समस्याओं निराकरण होता है। हमारे देश में 1 करोड़ से अधिक साधु हैं। इनमें कुछ सुयोग्य साधु हैं। तो कई लोग परिवार की जिम्मेदारी छोड़कर साधु बन गए हैं।

डॉ. गोपी वल्लभ पाटीदार ने कहा गृहस्थी में रहकर ईश्वर को पाया जा सकता है। कई संत गृहस्थ संत हुए हैं। रामकृष्ण परमहंसजी ने कहा है गृहस्थ रूपी किले में रहकर शत्रुओं का विनाश करना पड़ता है। डॉ. पाटीदार ने कहा पति-प|ी प्रेम, विश्वास के साथ एक-दूसरे के सहयोगी बनकर रहेंगे तो घर स्वर्ग बन जाएगा। नारी सदी में गृहलक्ष्मी है। पुरुष एक सहयोगी है। नारी को प्रतिभावान, सुशिक्षित और स्वस्थ बनाएं। जिस घर में नारी का सम्मान है वह स्वर्ग है। जहां उन्हें प्रताड़ित किया जाता है वह घर नर्क है। आज बेटियों की संख्या कम हो रही है। लिंगानुपात निरंतर कम होता जा रहा है। यह चिंता का विषय है। भ्रूण हत्या नहीं करें।

डॉ. गोपी वल्लभ पाटीदार

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