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मन की शांति के लिए सत्कर्म आवश्यक

7 वर्ष पहले
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श्रीमद् भागवत कथा सुनने के उमड़ रहे श्रद्धालु

भास्करसंवाददाता| छतरपुर

जबप्राणी धर्म अनुष्ठान में मन-तन अर्पण कर सद्भावना से सत्पुरुष भगवान श्रीनारायण की सेवा करता है तो उसके उस मन को शांति मिलती है। इसकी तलाश में वह जन्म-जन्मांतर से भटक रहा था। ये उद्गार चेतगिर मंदिर में चल रही भागवत कथा में रविवार को पं. भगवती प्रसाद कौशिक ने प्रकट किए। उन्होंने कहा कि अनेक प्रकार के कर्म करता हुआ जीव विभिन्न योनियों में जन्म लेते हुए मनुष्य शरीर को प्राप्त करता है। इस जन्म में वह संत, गुरू की शरणागति होने पर अनुष्ठान में बैठता है तो भी वह अपार शांति का अनुभव करता है।

मनु कर्दम संवाद का विश्लेषण करते हुए पंड़ित कौशिक ने कहा कि श्री कर्दम जी महाराज ने अपने पिता ब्रह्मा की आज्ञा पाकर वन में जाकर धर्मानुष्ठान प्रारंभ किया। इससे उन्हें भगवान की कृपा के साथ-साथ परम शांति का अनुभव हुआ और उन्होंने साधना में हजारों वर्ष वहीं बिता दिए। साधना के कारण मन निर्मल और तन उज्जवल हो गया। मन से सभी प्रकार की लालसाएं समाप्त हो गईं। पं. कौशिक कहते हैं कि भले ही भक्त के मन में किसी प्रकार की कोई इच्छा हो पर भगवान तो भक्त को सभी प्रकार का सुख प्रदान करते हैं। जैसे पिता अपने पुत्र की सभी इच्छाएं पूर्ण करता है ठीक उसी प्रकार भगवान भी अपने भक्त को सभी सुख देते हैं।

उन्होंने कहा कि जैसे मां हर दुख सहकर अपने बेटे को प्रसन्न देखना चाहती है वैसे ही ईश्वर भी अपने साधक को हमेशा प्रफुल्लित देखना चाहता है। उन्होंने कहा कि जब भक्त और भगवान में ऐसा संबंध हो जाता है तो ईश्वर और जीव में कोई भेद नहीं रह जाता।

पं. भगवती कौशिक ने कहा कि इस कलयुग में भक्ति और साधना के द्वारा ही भगवान की प्राप्ति की जा सकती है। आप अपने समय का कुछ अंश भागवत कथा के श्रवण में लगाएं इससे परमात्मा की निकटता हासिल हो सके। भागवत कथा के तीसरे दिन सोमवार को गजेंद्र मोक्ष, वामन अवतार और समुद्र मंथन की कथा होगी।

छतरपुर. भगवतीप्रसाद कौशिक महराज।

छतरपुर चेतगिरीकालॉनी में चल रही श्रीमद् भागवत कथा को सुनते श्रद्धालु