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समुद्र मंथन में निकले अद्भुत रत्न को बताया
रामजी महाराजा ने समुद्र मंथन की कथा का किया वर्णन
भास्करसंवाददाता | छतरपुर
शहरमें सागर रोड चल रही श्रीमद् भागवत कथा में छठवें दिन मंगलवार को समुद्र मंथन की कथा सुनाई। समुद्र मंथन में निकले र|ों के बारे में बताया। कथा सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे।
अयोध्या से आए पं रामजी महाराज ने बताया कि भगवान ब्रम्हा के कहे अनुसार देवाताओं और राक्षसों में सुलह के बाद समुद्र मंथन होता है। मंथ में एक-एक करके विष, अमृत, वज्र, हाथी, घोड़ा, हीरा मोती सहित तमाम तरह की अद्भुत र| निकलते हैं। जो देवताओं और राक्षसों में बराबर-बराबर बांट दिए जाते हैं। लेकिन जब मंथन में विस निकलता है तब तो कोई देवता इसे लेते हैं और ही राक्षस इसे ग्रहण करते हैं। तब परम पिता ब्रम्हा जी के कहने पर देवता भगवान शिव से इसे ग्रहण करने के लिए विनती करते हैं।
भगवान शिव इस विष को अपने कंठ में ग्रहण करते हैं। इसके बाद मंथन के दौरान अंत में जब अमृत निकलता है तो इसे पाने के लिए देवताओं और राक्षसों में विवाद हो जाता है। तभी भगवान नारायण एक मनमोहिनी का रूप धारण कर उनकी लड़ाई शांत कराते हैं। दोनों पक्षों में बारी-बारी से अमृत पान कराने की बात कहते हैं। सभी लोग मान जाते हैं। अमृत पान करने लाइन से बैठ जाते हैं। भगवान जानते हैं कि अगर धरती पर राक्षस अमर हो जाएंगे। तो वह सृष्टि का विनास कर देंगे और धरती पर चारों ओर अधर्म हो जाएगा। इससे भगवान देवताओं को तो अमृत पिला देते हैं जबकि राक्षसों मीठा रस पिलाते हैं। इस प्रकार धरती पर धर्म भी बना रहता है। और देवता भी खुश रहते हैं। भागवत कथा के दौरान बड़ी संख्या में महिला श्रद्धालु मौजद रहे।