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समुद्र मंथन में निकले अदभुत रत्न

6 वर्ष पहले
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सागर रोड पर चल रही श्रीमद् भागवत कथा का छटवां दिन

भास्करसंवाददाता | छतरपुर

शहरमें सागर रोड चल रही श्रीमद् भागवत कथा में छटवंे दिन मंगलवार को समुद्र मंथन की कथा सुनाई और समुद्र मंथन में निकले र|ों के बारे में बताया। अयोध्या से पं रामजी महाराज ने बताया कि भगवान बृम्हा के कहे अनुसार देवाताओं और राक्षसों में सुलह के बाद समुद्र मंथन होता है। मंथ में एक एक करके विष, अमृत, बज्र, हाथी, घोड़ा, हीरा मोती सहित तमाम तरह की अदभुत र| निकलते हंै। जो कि देवताओं और राक्षसों में बराबर बराबर बांट दिए जाते हैं, लेकिन जब मंथन में विष निकलता है तो ना कोई देवता इसे लेते है और ना ही राक्षस इसे ग्रहण करते हंै। तब परम पिता बृम्हा जी के कहने देवाता भगवान शिव से इसे ग्रहण करने के लिए विनती करते हैं और भगवान शिव इस विष को अपने कंठ में ग्रहण करते हंै। इसके बाद मंथन के दौरान अंत में जब अमृत निकलता है तो इसे पाने के लिए देवताओं और राक्षसों में विवाद हो जाता है। तभी भगवान नारायण एक मनमोहिनी का रूप धारण कर उनकी लड़ाई शांत कराते हंै और दोनों पक्षों बारी-बारी से अमृत पान कराने की बात कहते हंै। सभी लोग मान जाते हैं और अमत पान करने लाइन से बैठ जाते हंै। भगवान जानते हैं कि अगर धरती पर राक्षस अमर हो जाएंगे, तो वह श्रष्टी का विनाश कर देंगे और धरती पर चारों ओर अधर्म हो जाएगा। इससे भगवान देवताओं को तो अमृत पिला देते हैं, लेकिन राक्षसों अपनी माया से अमृत की जगह मीठा रस पिलाते हंै। इस प्रकार धरती पर धर्म भी बना रहता है और देवता भी खुश रहते है। भागवत कथा के दौरान बड़ी संख्या में महिला श्रद्धालु मौजद रहे।