पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें
  • Hindi News
  • नारी का अपमान संपूर्ण वंश के विनाश का कारण है : चक्रेश

नारी का अपमान संपूर्ण वंश के विनाश का कारण है : चक्रेश

6 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
नगरके वार्ड नंबर 1 में चल रही श्रीमद भागवत कथा के तीसरे दिन पं. चक्रेश शास्त्री महाराज ने कहा कि नारी शक्ति का रूप होती है। मनुष्य को हमेशा नारी का सम्मान करना चाहिए। भीष्म पिता ने नारी का सम्मान नहीं किया था इस कारण महाभारत में बाणों की सैया पर लेट कर अपने प्राण देने पड़े थे। शास्त्री जी ने कहा कि जब कौरव और पांडवों के बीच जुआ हुआ तो पांडवों ने द्रोपती को भी दाव पर लगा दिया और हार गए। दुशासन द्रोपती को महल से खींचकर द्रुतकीड़ा ग्रह में लेकर आता है जहां भीष्म पितामह जैसे अनेक महा योद्धा बैठे थे। द्रोपती ने सभी योद्धाओं से अपनी रक्षा करने की गुहार लगाई लेकिन किसी ने द्रोपती की गुहार नहीं सुनी। जिसके फलस्वरूप महाभारत हुआ और कौरव वंश का पूर्ण विनाश हो गया।

नारी का अपमान संपूर्ण वंश के विनाश का कारण बन जाता है। ऐसे ही सतयुग में रावण ने माता सीता का हरण करके ले जा रहा था और माता सीता की पुकार सुन कर जटायु ने रावण से युद्ध करते हुए नारी का सम्मान किया जिस कारण जटायु की मृत्यु स्वयं भगवान की गोद में हुई, और मात्र राम भक्त विभीषण को छोड़कर रावण के एक लाख पुत्र सवा लाख नाती सहित संपूर्ण परिवार का विनाश हो गया था।

छटवंे दिन की कथा में रुक्मणि विवाह प्रसंग सुनाया

दमोह|बूंदाबहुमंदिरमानसभवन में चल रही श्रीमद् भागवत कथा के छटवें दिन की कथा में पं. नीरज कृष्ण महाराज ने बताया कि भगवान श्री कृष्ण ने वृंदावन में महारास रचाया। श्रीमद् भागवत जी में रास पंचाध्यायी को राक्षस भगवान ने प्राण बताया गया है। एक दिन भगवान वृंदावन में वंशी वट पर रास रचा रहे थे तो सारी बृज की गोपियां भगवान के साथ नाच रही थी सारे देवी देवता आकाश मार्ग से पुष्प वर्षा कर रहे थे और झूम-झूम कर नाच रहे थे तो भगवान शंकर जी का मन नहीं माना और उन्होंने पार्वती जी का श्रंगार करवाया और साथ रास में गोपी बन गए भगवान की बांसुरी की धुन सुनकर सारी गोपियां दौडी़ चली आती थी। इस प्रकार भगवान ने महारास रचाया। एक बार कुंडलपुर के राजा भीष्मक का बडा़ पुत्र रुक्मि अपनी बहन रुक्मणि का विवाह अपने बचपन के मित्र शिशुपाल के साथ तय कर दिया लेकिन रुक्तणि जी ने तो भगवान श्री कृष्ण को ही अपना पति मान लिया। उनकी लीलाओं को सुनही की मन ही मन रुक्मणि जी ने उनको पति के रूप में वरण किया कि मैं तो इन्हीं से शादी करूंगी, रुक्मणि बडी़ चिंतित हुई अपने भाई की बात सुनकर तभी रुक्मणि जी ने एक पत्र लिखा और एक ब्राहम्ण के हाथ से उसे द्वारिका भगवान के पास भेजा कान्हा जी ने पत्र पढ़ा और उसी क्षण भगवान रुक्मणि जी को लेने चल दिए।

धार्मिक

तेंदूखेड़ा। रविवार को श्रीमद्भागवत कथा सुनते श्रद्धालु।