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मिसाल-बेमिसाल | टीकमगढ़ और दमोह जिले में प्रकृति से प्रेम करने वालों ने बदल दी गांवों की तस्वीर, पौधे को िदया नया जीवन

6 वर्ष पहले
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800 पौधों की रखवाली: ढाईएकड़ जमीन में अंबिका ने रोपे फलदार पौधे

जल के साथ पर्यावरण संरक्षण: ड्रिपविधि से पौधे की जड़ों को पहुंचा रहे पानी

घर-घर पौधे लगाने की होड़ : घानामैलीको कहने लगे हरियाली वाला गांव

ओमप्रकाश शर्मा| बनवार

जबेराजनपद के छोटे से गांव घाना मैली की बसाहट तक भले ही शासन की मूलभूत सुविधाएं पहुंचीं हो लेकिन लोगों के प्रकृति प्रेम ने इस गांव की पहचान सबसे ज्यादा हरियाली वाले गांव के रूप में बना दी है। लोगों ने बताया कि 1988 में पेड़-पौधों को सहेजना शुरू किया गया था। 26 वर्ष के अंदर आज घाना मैली गांव तथा आसपास बड़ी संख्या में पेड़-ही-पेड़ हैं। एक छोटी सी पहल के बाद गांव के घर-घर में पौधे लगाने की होड़ चल रही है। सन् 1988 में शिक्षित युवा और वर्तमान में चौपरा हाई स्कूल प्रभारी नरपाल सिंह ने लोक वानकी योजना के अंतर्गत 600 सागौन, 125 आंवला एवं 11 बांस के पौधों का रोपण दो एकड़ में किया था। इन पौधों को सहेजने और संरक्षण के लिए उन्होंने राज्य वन अनुसंधान पोली पाथर में 7 दिवसीय ट्रेनिंग ली थी। इनकी इस पहल को आत्मसात करते हुए यहीं के छत्रपाल सिंह ने भी एक एकड़ छोटे घास की जमीन पर 100 सागौन और पांच सौ से अधिक सभी प्रकार के पौधों का रोपण किया। जिसके बाद पेड़ पौधे जैसे-जैसे वृक्षों में तब्दील होते गए तो इस प्रयास को सभी ने केवल सराहा बल्कि गांव के हर व्यक्ति ने अपने घर में पेड़ पौधों को लगाने का सिलसिला शुरू कर दिया। जिसके चलते मेघराज सिंह ने जहां सैकड़ों वृक्ष संरक्षित कर रखे हैं। तो वहीं प्रेम सिंह, उदय यादव, बखत सिंह, नन्ने भाई, भरत यादव ने अपने-अपने घर की बाड़ी में दस से पंद्रह वृक्षों को संरक्षित किया है। आज गांव के लोग एक संकल्प के साथ हर घर में पेड़ पौधे लगाने का काम कर रहे हैं। एसडीओ वन एमएस उइके का कहना है कि ग्रामीणों का वृक्षों के प्रति लगाव वास्तव में तारीफ के काबिल है। वृक्षों को संरक्षित करने के काम में जहां कहीं ग्रामीणों को विभागीय सेवा की आवश्यकता होगी जरूर उपलब्ध की जाएगी।

नीरज सोनी| दमोह

शहरमें पर्यावरण के साथ जल संरक्षण को लेकर लोगों में जनजागरूकता एवं जनता की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए एक्सीलेंस स्कूल के छात्रों ने अनूठी पहल की है। जानकारी के अनुसार एक्सीलेंस स्कूल के छात्रों ने स्कूल के पीछे क्यारियों में जुलाई-अगस्त में पौधे रोपे थे। बारिश में तो पौधे सुरक्षित रहे, लेकिन पानी की कमी के चलते यह पौधे सूखने की कगार पर पहंुच गए थे। अपने द्वारा लगाए गए इन पौधों को सूखते देखकर छात्र भी परेशान थे। दूसरी ओर इन पौधों में रोजाना पानी देना संभव नहीं था। इस समस्या को हल करने के लिए स्कूल के भावा विज्ञान क्लब के छात्रों ने मार्गदर्शक शिक्षक जीपी पटेल के निर्देशन में ऐसे तरीके सोची जिससे कम पानी में भी पौधे सुरक्षित रह सकें। इसके लिए छात्रों ने मरीजों को उपयोग में आने वाली ग्लूकोज की प्लास्टिक की बाटलों को प्रत्येक पौधे के पास लगाकर पौधों की जड़ों तक ड्रिप पद्धति से बंूद-बंूद पानी पहंुचाया गया। जिससे यहां लगे पौधों में दोबारा जीवन मिल गया है। अब उनमें फिर से हरियाली लौटने लगी है। इन बॉटल को एक बार पानी से भरने के बाद दो से तीन दिन तक पौधों में नमी बनी रहती हैऔर पानी की प्रत्येक बंूद का सुदपयोग भी हो जाता है। छात्र नयन सोनी, सुधीर गर्ग, सतीश, रविशंकर, कार्तिक, मयंक राय, प्रशांत मिश्रा, शिवम, ओंकार केशरवानी ने इस विधि को साकार रूप दिया है। शिक्षक जीपी पटेल ने बताया कि इस विधि से पौधों में काफी समय तक नमी बनी रहती है और पानी का वाष्पीकरण भी नहीं होता। यदि बच्चों की इस सोच को आमजन भी अंगीकार करें तो काफी हद तक जल संरक्षण किया जा सकेगा। छात्रों की इस पहल को प्राचार्य केके पांडेय, मॉडल स्कूल प्राचार्य जीपी सक्सेना, एग्रीकल्चर विभाग के डीपी कटारे, प्रशांत खरे का सहयोग रहा।

शैलेंद्र द्विवेदी | टीकमगढ़

2001में रिटायरमेंट के बाद सोचा कि धार्मिक स्थान पर जाकर पूजा पाठ करें। फिर पूर्वजों की ढाई एकड़ जमीन का ख्याल आया। पारंपरिक खेती में रुचि नहीं थी इसलिए पौधे लगाना शुरू किया। 30 साल की मेहनत के बाद अब बगीचे में 800 से ज्यादा फलदार पौधे लग गए हैं। साथ में फूल और सब्जी की खेती भी हो रही है। गुलाब के फूल और सब्जियां बेचने से हर साल 50 से 60 हजार का मुनाफा होने लगा है। अब सोच लिया है कि चारों धाम यही है। पौधे लगाना और उनकी देखभाल करना ही जीवन का उद्देश्य बन गया है। यह कहना है शहर के पुरानी टेहरी निवासी 80 वर्षीय अंबिका प्रसाद तिवारी एक्सीलेंस स्कूल क्रमांक-1 से स्पोर्ट्स टीचर के पद से 2001 में रिटायर्ड हुए। फिर पैतृक जमीन में पेड़ पौधे लगाने में पूरा समय बिताना शुरू कर दिया। सालों की मेहनत अब रंग लाने लगी है। बगीचे में चारों ओर फलदार पेड़ दिखाई देने लगे हैं। तिवारी ने बताया कि बगीचे में कटहल के 50, अमरूद के 100, नींबू के 50, करौंदा के 100, बांस के 100, सागौन के 100 और आम के 25 पेड़ लगाए जा चुके हैं। फिर फूल और सब्जी की खेती शुरू की। दो साल पहले गुलाब के 400, पपीता के 100 पौधे लगाए। एक साल में ही उपज तैयार होने लगी। सर्दियों में गुलाब के फूलों की पैदावार होती है। खरीदार खेत में आकर 120 रुपए किलो में खरीदकर ले जाते हैं। सब्जी के मौसम में हर दिन 500 रुपए मिल जाते हैं। हर साल करीब 50 से 60 हजार रुपए का मुनाफा होने लगा है। उम्र के इस पड़ाव में पूरे जुनून के साथ पौधे लगाने में जुटे तिवारी ने बताया कि पेड़-पौधों को लेकर लोग उदासीन हो गए हैं। लगातार पेड़ों को काटा जा रहा है। लेकिन नए पौधे नहीं लगाए जा रहे हैं। कभी सड़क निर्माण तो कभी औद्योगीकरण के नाम पर जंगल नष्ट किए जा रहे हैं।