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पितरों की शांति के लिए तर्पण करें : पं. गौतम

7 वर्ष पहले
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भारतभूमि में मनुष्य जन्म मिलना ही पूर्व जन्म में श्रेष्ठ कर्मों का प्रमाण है। इसलिए हमारा भी फर्ज है कि हम अपने पूर्वजों-पितरों का तर्पण पूरी श्रद्धा से करें और उन्हें भटकाव से मुक्ति दिलाएं। तर्पण और श्राद्ध का पुण्यफल अनंत काल तक अनेक पीढ़ियों को मिलता है। यह बात बैकुंठधाम किशुन तलैया में तर्पण क्रिया के दौरान पंडित मुन्नालाल गौतम ने व्यक्त किए।

उन्होंने कहा कि पितरों के लिए श्रद्धा से किए गए मुक्ति कर्म को श्राद्ध कहते हैं तथा तृप्त करने की क्रिया और देवताओं, ऋषियों या पितरों को तंडुल या तिल मिश्रित जल अर्पित करने की क्रिया को तर्पण कहते हैं। तर्पण करना ही पिंडदान करना है। अपने पितरों की शांति एवं उनका आशीष प्राप्त करने के लिए प्रत्येक मनुष्य को पूर्वजों का तर्पण श्राद्ध करना चाहिए। उन्होंने कहा कि वैदिक धर्म में पितृपक्ष का महत्वपूर्ण स्थान है। पितृपक्ष का अभिप्राय है माता-पिता, दादा-दादी आचार्य आदि की सेवा करना। पितृपक्ष दो प्रकार के होते हैं जिनमे सें एक श्राद्ध दूसरा तर्पण है। माता-पिता आदि पितरों की सेवा करना, उनकी आज्ञा का पालन करना तथा उनके प्रति श्रद्धा भाव रखना ही श्राद्ध कहलाता है। वहीं अन्न जल, भोजन, फल वस्त्र आदि से उनको तृप्त करना तर्पण कहलाता है। पितृपक्ष में अपने मृतक पितरों की तिथि के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन आदि कराकर वस्त्र और दक्षिणा देकर श्राद्ध करना चाहिए। उन्होंने कहा पितृ पक्ष में गाय, कौआ कुत्ता को भोजन कराना फलदायक होता है। केवल दक्षिण दिशा में मुंह करके पूर्वजों को याद करने मात्र से पूर्वज प्रसन्न होते हैं। पितृ प्रसन्न होकर शांति, धन, पुत्र, विद्या संतति प्राप्त कराते हैं।

तर्पणसे गृह कलह की शांति : पं. त्रिपाठी

गांवकी सुनार नदी में तर्पण करने पहुंच रहे लोग

निजसंवाददाता। बांसा तारखेड़ा

गांवसे निकली कोपरा नदी में सुबह 6 बजे से ही तर्पण करने वालों की भीड़ एकत्रित हो जाती है। जिनका तर्पण कार्य पूर्ण विधि-विधान से पं. प्रदीप पाठक द्वारा कराया जा रहा है। इस अवसर पर श्री त्रिपाठी ने कहा कि शास्त्रों में मनुष्यों के लिए तीन ऋण बताए गए हैं। जिसमें देव ऋण, ऋषि ऋण पितृ ऋण है। पितृ ऋण को गुरू ऋण की संज्ञा दी गई है। प्रत्येक मनुष्य का क