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भक्ति करने से ही मिलता है मोझ: कृष्ण शास्त्री
स्थानीयबूंदाबहु मंदिर मानसभवन में चल रही श्रीमद् भागवत महापुराण के अंतिम दिवस की अमृतमयी धारा में श्री वृंदावन धाम से पधारे कथा व्यास पं. नीरज कृष्ण शास्त्री ने भगवान के सोलह हजार एक सौ आठ विवाहों का वर्णन किया। शिशुपाल पौण्डूक का उद्धार आदि कथाओं का वर्णन किया। श्री शास्त्री ने बताया कि हमारे जीवन में मित्र का भी बडा़ सहयोग रहता है। मित्रता का संदेश देते हुए व्यास जी ने सुदामा चरित्र सुनाते हुए भक्तजनों को भाव विभोर किया। भगवान के बचपन के मित्र सुदामा बड़े ही गरीब थे उन्होंने गुरुकुल में श्री कृष्ण के साथ ही शिक्षा ग्रहण की एक दिन में गुरू कुल में लकडी़ काटने के लिए गए, तो सुदामा भी साथ गए थे गुरू माता ने इन्हें भुने हुए चने दिए थे जो इन्होंने अकेले ही खा लिए थे, तो इसी चोरी की वजह से ये गरीब हुए। लेकिन ये भगवान के अन्याय भक्त थे एक दिन अपनी प|ी सुशीला के कहने पर में द्वारका गए जैसे ही श्री कृष्ण को पता चला तो तुरंत ही भगवान अपने सिंहासन से दौड़े-दौड़े चले पीतांबर कहीं पर गिर गया। प्रभु दौड़े दौड़े गए और सुदामा को गले से लगाए और अश्रु से सुदामा के चरण धुलवाए और तीनो लोको की संपत्ति सुदातमा जी को दे दी।
आगे की कथा में व्यास जी ने बताया कि मित्रता करो तो जैसी श्री कृष्ण ने सुदामा से की थी और व्यास जी ने भक्तों को सांख्य ज्ञान का उपदेश दिया। इस अवसर पर बडी संख्या में श्रद्धालुओं की मौजूदगी रही।
बनवार। क्षेत्र के ग्राम बम्हौरी में चल रही शिव महापुराण में कथा में रविवार को कथाव्यास पंडित आशीष मिश्रा ने शिव कथा में नारदमोह का प्रसंग सुनाया।
उन्होंने कहा कि शिव जैसे योगी ही कामादिक विकारों को भस्म करने की सामर्थ रखते हैं। अन्य किसी के बस की बात नहीं है। जो उनके आश्रय होकर उनका भजन करता है, वही इस विकारों से बच सकता है। शिवपुराण का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि एक समय नारदजी शिवजी के पास गए। शिव जी ने जिस स्थान पर कामदेव को भस्म किया था उस स्थान की विशेषता थी कि जहां तक व्यक्ति की दृष्टि जाएगी वहां तक कामदेव का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। उसी स्थान पर बैठकर नारद जी ने तपस्या की और कामदेव को परास्त कर दिया। इसके बाद शिव की प्रबल माया के मोह में पड़ कर उन्हें अंहकार हो गया कि उन्होंने कामदेव को जीत लिया, लेकिन राजा शील की कन्या विश्वमोहनी को देखकर नारद पुनः काम विह्वल हो गए और भगवान विष्णु से उनका स्वरूप मांगने चले गएे। जिससे वह कन्या मेरा ही वरण करे। शिव जी ने जब काम को भस्म किया था तब उन्हेंं किसी प्रकार का अंहकार नहीं था
और ही उन्हे फिर कामदेव प्रभावित कर सका। देवताओं का कार्य साधना के लिए है। लेकिन उन्होंने काम को अलग रुप में प्रगट कर दिया। इसके पहले रविवार की सुबह पार्थिव शिवलिंग का निर्माण किया गया। इसके बाद पंडित आशीष मिश्रा के सानिध्य में शिवजी का अभिषेक पूजन किया गया। बनारस से पधारे पंडित अभिषेक दुबे शास्त्री ने रूद्राभिषेक कराया। जिसमें गांव के सैकड़ों श्रद्धालु मौजूद थे।
भक्ति करने की कोई उम्र नहीं होती है
तेंदूखेड़ा।नगर के वार्ड नंबर 1 में श्रीमद् भगवत कथा चल रही है। सोमवार की कथा में पं. चक्रेश शास्त्री ने बताया कि जिस प्रकार मनुष्य को जीने के लिए भोजन, जल एवं वायु की आवश्यकता होती है उसी प्रकार भव सागर को पार करने के लिए भगवान की भक्ति एवं भजन की आवश्यकता होती है। जैसे महाराज मनु और रानी सत् रूपा। मनु का अर्थ मन है और सत्रुपा का अर्थ शरीर है। राजा मनु और सत्रुपा ने विचार किया कि चौथी अवस्था में गृहस्थी में रहकर ब्रम्ह की प्राप्ति नहीं हो सकती।
मनु एवं सत्रुपा संतो ंके सत्संग में पहुंचे जहां संतों ने कहा कि पुरुष और स्त्री मिल कर ही ब्रम्ह को प्राप्त कर सकतें हैं। जहां पुरुष का अर्थ ज्ञान और स्त्री का अर्थ भक्ति है। जब तक ज्ञान और भक्ति नहीं मिलेंगे तब तक ब्रम्ह की प्राप्ति नहीं होगी। राजा मनु एवं सत्रुपा ने मिलकर ब्रम्ह की उपासना और भक्ति की तो उन्हें साक्षात परब्रम्ह परमात्मा की प्राप्ति हुई। इसी प्रकार भक्त प्रहलाद एवं ध्रुव ने पांच वर्ष की आयु में ही भगवान की भक्ति कर ब्रम्ह को प्राप्त कर भव सागर से पार होने का रास्ता खोज लिया था।
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