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रोग लगने से नष्ट होने लगे अमरूद के बगीचे

5 वर्ष पहले
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बगीचा मालिकों के सामने आजीविका का संकट

भास्कर संवाददाता | उनाव

बालाजी के लडुआ, बड़े मिठउआ, पेट भरउआ.. की आवाज अब यहां की सब्जी मंडियों में नहीं सुनाई दे रही है। अब यहां न तो पहले के जैसी चहल पहल दिखाई देती है और न ही लोग यहां खरीदारी करने आते हैं। कारण साफ है। उनाव सहित आसपास की मंडियों में सबसे ज्यादा बिक्री अमरूद की होती थी। लेकिन अमरूद के पेड़ों में रोग लगने के कारण पेड़ सूख रहे हैं और अमरूद की आवक एक दम घट गई है। खास बात यह है कि फलोद्यान को बढ़ावा देने के लिए जहां एक ओर सरकार तमाम योजनाएं चला रही हैं वहीं मुख्यालय पर बैठे उद्यानिकी विभाग के अधिकारी कार्यालय में बैठकर समय निकाल रहे हैं।

जिले में लगभग 60 हेक्टेयर में अमरूद के बगीचे लगे हैं। इनमें सबसे ज्यादा कस्बा उनाव में 10 हेक्टेयर जमीन पर अमरूद के बगीचे लगे हैं। यहां वर्षों से अमरूद की खेती होती आ रही है। जिले में उनाव का अमरूद सबसे लोकप्रिय माना जाता है। लेकिन धीरे धीरे यहां अमरूद के बगीचे सूखते जा रहे हैं। कभी इन बगीचाें से अपनी जीविका चलाने वाले बगीचा मालिकों के सामने रोजी रोटी का संकट पैदा होने लगा है। इन बगीचों में इंटरविला नामक रोग गया लग गया है। यह रोग अमरूद के पेड़ों को अंदर ही अंदर खोखला कर रहा है जिससे पेड़ सूख रहे हैं। दतिया एवं उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्रों में लगे अमरूदों के बगीचों की संख्या एक दशक पहले सैकड़ों में थी लेकिन बीमारी के चपेट में आने से बगीचों की संख्या वर्तमान में उंगलियों पर गिने जाने लायक बची है। खास बात यह रही कि बगीचा मालिकों की गुहार को उद्यानिकी विभाग के अधिकारियों ने खास तवज्जो नहीं दी। अधिकारियों द्वारा महज खानापूर्ति की गई।

रोग लगने से सूख रहे अमरूद के पेड़
पहूज नदी के उस पार मैंने 30 बीघा जमीन में अमरूद का बगीचा लगाया है। अमरूद के पेड़ों में रोग लग गया है, जिससे पेड़ सूखने लगे हैं। पूरा परिवार अमरूद की खेती से पल रहा था अब क्या करेंगे, कुछ समझ में नहीं आ रहा है। एक समय था जब उनाव के अमरूद की बाहर की मंडियों में बेहद ज्यादा मांग थी, लेकिन बीमारी ने बगीचे ही नष्ट कर दिए। कई बार विभाग से गुहाल लगाई, लेकिन सुनवाई नहीं हुई। दम्मा रायकवार, कृषक उनाव

नया बगीचा लगाया, उसमें भी लग गया रोग

रोग लगने के कारण पुराना बगीचा सूख गया था। नया बगीचा तैयार किया था लेकिन नए पेड़ों में भी हुमसा रोग लग गया है। जिससे नए पेड़ भी सूखने लगे हैं। कैलाश रायकवार, झांसी रोड उनाव

अमरूद के बगीचों को मुआयना करवाया

अमरूद के बगीचों में बिल्टी नामक रोग लग गया है। हमारे द्वारा एक माह पहले कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. एके सिंह से उनाव में बगीचों का मुआयना करवाया गया था। एक महीने पहले वरिष्ठ अधिकारियों को पत्र भी लिखा है। डीके उदैनिया, वरिष्ठ ग्रामीण उद्यान विस्तार अधिकारी, दतिया

बाहर की मंडियों में जाता रहा है उनाव का अमरूद
उनाव क्षेत्र में स्थित बगीचों से अमरूद बिकने के लिए लड़ुआ नाम से कानपुर, लखनऊ, झांसी सहित क्षेत्र की सभी मंडियों में बिकने जाता है। बालाजी के अमरूद अपनी अलग खुशबू बिखेरते हैं। लखनवी एवं इलाहाबादी देशी किस्म के सुर्ख लाल एवं सफेद अमरूद सूर्य मंदिर दर्शनार्थ आने वाले यात्रियों की पहली पसंद हुआ करते हैं।

दस साल पहले भी लगा था रोग:इंटरविला नामक रोक दस साल पहले उनाव के बगीचों में लगे अमरूद के पेड़ों में लग गया था। तब अधिकांश बगीचे सूख गए। किसानों ने पुन: इन बगीचों को तैयार किया। अब फिर से यह बीमारी अमरूद के पेड़ों मे लग गई है। जिससे किसानों के सामने जीविकोपार्जन का संकट पैदा होने लगा है। काल के रूप में आई इंटरविला बीमारियों ने यहां के अमरूद के बगीचों को धीरे धीरे निगल रहे हैं।

पहूज नदी किनारे लगे अमरूद के पेड़ रोग लगने के कारण सूखने लगे हैं।

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