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नदी में श्मशान घाट, खेतों में करते हैं दाह संस्कार

4 वर्ष पहले
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साढ़े तीन किमी दूर बना है श्मशान घाट

भास्कर संवाददाता | दतिया

कस्बा बसई के लोगों को गांव के आसपास श्मशान घाट की सुविधा नहीं है। गांव से साढ़े तीन किमी बेतवा नदी के अंदर श्मशान घाट के नाम पर दो चबूतरे बने हैं। यह चबूतरे नदी में बारिश का पानी बढ़ते ही डूब जाते हैं। न तो टीनशेड है और न ही बैठने का सुरक्षित स्थान। बारिश के दिनों में गांव के लोग गांव के बाहर खेतों में दाह संस्कार करते करने को मजबूर हैं।

जिला मुख्यालय से 80 किमी दूर कस्बा बसई की वर्तमान आबादी 6580 के करीब है। इतनी बड़ी आबादी वाले इस कस्बे को एक व्यवस्थित श्मशान घाट भी ग्राम पंचायत बनाकर नहीं दे सकी है। छह साल पहले कस्बा से साढ़े तीन किमी दूर एक श्मशान घाट का निर्माण बेतवा नदी में कराया गया था। श्मशान घाट के नाम पर दो चबूतरों का निर्माण कराया गया। न टीनशेड लगवाया और न ही दाह संस्कार में आने वाले लोगों के लिए पानी और छाया की सुविधा है। गर्मियों में जहां पत्थरों के बीच दाह संस्कार करना मुश्किल होता है तो बारिश में नदी के उफान पर आते ही दोनों चबूतरे नजर तक नहीं आते हैं। तीन महीने तक नदी उफान पर रहती है। बरात में भोपाल राजघाट बांध में अधिक बारिश होने से पानी नदी में छोड़ दिया जाता है। कई बार गेट खोले और बंद किए जाते हैं। नदी में करीब तीस फीट से अधिक ऊंचाई पर पानी बहता है। नदी में अधिक पानी आने पर बसई सहित देवगढ़, चौबाहा, हीरापुर आदि गांवों में अलर्ट कर दिया जाता है। देवगढ़ गांव में तो कई बार घरों में पानी तक भर जाता है। इस स्थिति में बेतवा नदी के दो किमी दूर तक पानी ही पानी दिखाई देता है।

तब श्मशान घाट सहित नदी से पैंतीस फीट ऊंचाई पहाड़ पर बिराजमान भगवान शिव का मंदिर भी डूब जाता है। एेसी स्थिति में लोगों को दाहसंस्कार करने में बहुत ही परेशानी उठानी पड़ती है।

जिनके पास जमीन है वह तो वह अपनी जमीन पर दाहसंस्कार कर लेते हैं, लेकिन जिनके पास जमीन नहीं है वे नदी में पानी कम होने का इंतजार करते हैं या फिर सड़क किनारे दाह संस्कार करने को मजबूर होते हैं।

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