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70 साल से जगा रहे पढ़ने की अलख

5 वर्ष पहले
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1946 में हुई पुस्तकालय की स्थापना
आजादी के पहले 1946 पुस्तकालय की स्थापना हुई थी। तत्कालीन साहित्यकार स्व. गंगाराम शास्त्री, स्व. अयोध्याप्रसाद तिवारी, स्व. गुलाब श्रीवास्तव, स्व. अंबाप्रसाद श्रीवास्तव, स्व. दुर्गा प्रसाद कुन्नई, एवं पं. जगमोहनलाल दीक्षित ने पुस्तकालय की शुरुआत की थी। स्वयं के व्यय पर किताब खरीद कर, घर-घर जाकर साहित्य इकट्‌ठा कर एवं स्वरचित साहित्य को संकलित कर साहित्य प्रेमियों को उपलब्ध कराया गया। 1948 मेंं पुस्तकालय का औपचारिक नाम महात्मा गांधी से प्रेरित होकर गांधी पुस्तकालय रखा गया। इसी दौरान स्व. रामभरोसे पाठक एवं स्व, हरिहर शर्मा हरिकेश ने पुस्तकालय को बड़ी संख्या में पुस्तकें दान में दीं तथा दतिया रियासत के दीवान एनुद्दीन ने दो हजार दान स्वरूप दिए। इस प्रकार पुस्तकालय की नींव मजबूत हुई। यहां शहीदों की याद में एक जयस्तंभ भी बनवाया गया जो आज भी दर्शन का केंद्र रहता है।

संेवढ़ा में स्थित गांधी पुस्तकालय।

आजादी से पहले बन गया था गांधी पुस्तकालय

भास्कर संवाददाता | सेंवढ़ा

सेंवढ़ा स्थित गांधी पुस्तकालय 70 साल से लोगों में शिक्षा का अलख जगा रहा है। आजादी से पहले की स्थापना वाला यह नगर का एकमात्र संस्थान है जो कि रोज खुलता है। पाठक यहां आते हैं और मुफ्त में ही सभी प्रकार के दैनिक अखबार एवं पत्रिकाओं का वाचन करते हैं। अगर उन्हें पुस्तक अपने घर पर ले जाना है तो केवल 100 रुपए की सदस्यता शुल्क में वह दुर्लभ साहित्य एक दो दिन के लिए घर पर भी ले जा सकते हैं।

सेंवढ़ा में गांधी पुस्तकालय नगर के हृदयस्थल बस स्टैंड पर स्थित है। बगैर किसी शासकीय फंड के यह संस्था खुद की संपत्ति से अर्जित होने वाले किराए एवं पाठकों के चंदे से चल रही है। संस्था के पास वर्तमान में बारह हजार से अधिक पुस्तकें हैं। खास बात यह है कि यहां अत्यंत दुर्लभ प्राचीन एवं नवीन पुस्तक का एक साथ समावेश मिलता है। यहां मौजूद दुर्लभ साहित्य पर गौर करें तो पूर्व के शासकों एवं तत्कालीन साहित्यकारों द्वारा रचित हस्तलिखित पुस्तकें, पत्र व्यवहार की प्रतियां, हरवंश पुराण, भगवत पुराण, मारकंडे पुराण, पत्र पांडुलिपी के अलावा उर्दू ग्रंथ मौजूद हैं। पुस्तकालय में आने वाले पाठकों के बैठने के लिए विशाल हॉल बना हुआ है। इसके अलावा एक परिसर भी है जो खुली धूप में अध्यापन कार्य करने की सुविधा उपलब्ध कराता है। पढ़ने में रुचि रखने वाले सभी आयु वर्ग के 200 से अधिक लोग यहां रोज आकर अध्ययन करते हैं। बगैर किसी सदस्यता शुल्क के भी लोग किताबें और अखबार पढ़ते हैं। इतिहास एवं साहित्य में रुचि रखने वाले शोधार्थी तो देश से यहां आकर दुर्लभ जानकारी प्राप्त करते हैं। पुस्तकालय को शासन की ओर से कोई अनुदान नहीं मिलता। फिर भी न तो इसकी व्यवस्था में कोई कमी रहती और नहीं साहित्यक आयोजन की गरिमा में।

42 वर्ष से जारी है बसंतोत्सव का आयोजन:पुस्तकालय को गति 1973 में तब मिली जब तत्कालीन पुस्तकालय समिति अध्यक्ष रामस्वरूप शर्मा दद्दा द्वारा दिवंगत साहित्यकार डा. सीताकिशोर खरे के निर्देशन में बसंतोत्सव समारोह की शुरुआत की। वर्ष में एक बार अखिल भारतीय स्तर का कवि सम्मेलन एवं दिन में नगर के वैभव संत कवि अक्षर अनन्य एवं नरेश कवि पृथ्वी सिंह रसनिधि की स्मृति में कार्यक्रम का आयोजन प्रारंभ हो गया। कार्यक्रम के अलावा पुस्तकालय को साहित्य क्षेत्र में पहचान दिलाने के लिए साहित्यकार डा. श्यामबिहारी श्रीवास्तव, डा. कामिनी, डा. अवधबिहारी पाठक, महेश दीक्षित ने भी विशेष परिश्रम किया। दद्दा के नाम से पहचाने जाने वाले श्री शर्मा लगभग 40 वर्ष तक संस्था के अध्यक्ष रहे। इस दौरान पुस्तकालय अपनी ऊंचाइयों तक पहुंचा।

यह समिति कर रही है संचालन:पुस्तकालय समिति का संचालन अध्यक्ष सुरेश पटेल के नेतृत्व में किया जा रहा है। संचालन समिति में उपाध्यक्ष पद पर जगतसिंह राजपूत, महामंत्री पद पर रामप्रकाश पाठक, कमलेश शर्मा एवं कोषाध्यक्ष पद पर रमाशंकर नगरिया काबिज हैं। इसके अलावा 11 समिति सदस्य एवं 500 से अधिक आजीवन सदस्य आजादी के पहले से चल रहे इस पुस्तकालय को समय के अनुसार अपग्रेड कर रहे हैं।

आम पाठकों को नि:शुल्क उपलब्ध कराते हैं अखबार
पुस्तकालय में विशिष्ट स्तर की मासिक, पाक्षिक एवं साप्ताहिक पत्र-पत्रिकाओं का संयोजन किया जाता है तथा आम पाठक को वाचनालय में नि:शुल्क दैनिक समाचार पत्र उपलब्ध कराए जाते हैं। मामूली सदस्यता शुल्क में हम दुर्लभ साहित्य भी लोगों को उपलब्ध कराते हैं। हमारा लक्ष्य युवाओं में साहित्य के प्रति जागरूकता बनाए रखना है। सुरेश पटेल, अध्यक्ष, गांधी पुस्तकालय

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