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फेसबुक के साम्राज्यवाद पर हमारा करारा प्रहार

5 वर्ष पहले
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भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) के फैसले से फेसबुक की फ्री बेसिक्स योजना पर पानी फिरने से कंपनी के अमेरिका स्थित बोर्ड डायरेक्टर मार्क एंड्रीसन आपा खोकर भारत के विरुद्ध भड़क गए। उन्होंने ट्वीट कर कहा कि इंटरनेट टैरिफ को लेकर भारत सरकार का फैसला सही नहीं है और भारत अगर ब्रिटिश शासन के अधीन होता तो इसकी हालत ज्यादा बेहतर होती। इसके पहले फेसबुक के संस्थापक मार्क ज़करबर्ग ने भी ट्राई के आदेश का सम्मान करने की बजाय पोस्ट लिख कर येन-केन प्रकारेण भारतीय बाजार में कब्जे के संकल्प को दोहराकर भारत के क़ानून और सार्वभौमिकता को चुनौती दी थी।

यह सवाल लाजमी है कि मुफ्त की सेवा देने के लिए फेसबुक इतना बेचैन क्यों है, जिसके लिए उसके द्वारा एक महीने के भीतर 300 करोड़ रुपए से अधिक सिर्फ विज्ञापन पर ही खर्च कर दिए गए। दरअसल, फेसबुक द्वारा वॉट्सअप को खरीदने के बाद भारत में 13 करोड़ फेसबुक यूज़र्स और 10 करोड़ वॉट्सअप यूज़र्स मिलकर फेसबुक को दुनिया का सबसे बड़ा बाजार देते हैं। इस संख्या को बढ़ाकर फेसबुक दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी बनने का सपना देखती है। एंड्रीसन फेसबुक कंपनी में बड़े निवेशक हैं, जो सपनों का महल टूटने से भारत को अपमानित कर रहे हैं।

गौरतलब है कि तथाकथित मुफ्त सेवा देने वाली फेसबुक द्वारा भारत के बाजार से लाखों करोड़ की आमदनी आयरलैंड और अमेरिका भेजी जा रही है। ऑक्सफैम की रिपोर्ट से भी यह स्प्ष्ट है, जिसके अनुसार बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा 509 लाख करोड़ रुपए से अधिक का पैसा आयरलैंड एवं अन्य टैक्स हैवन देशों में जमा किया गया है। भारत में वर्ष 2014 में कंपनी कानून में संशोधन के बावजूद फेसबुक द्वारा भारत में स्थानीय कार्यालय और टैक्स रिटर्न के क़ानून का पालन नहीं किया जा रहा है। फेसबुक द्वारा लाभ का दो फीसदी पैसा सीएसआर के तहत सामाजिक कार्यों में खर्चकर मानवीय समाज को सशक्त करने की बजाय आम जनता को गुमराह करने वाले विज्ञापन दिए जा रहे हैं।

फेसबुक की रिपोर्ट के अनुसार 7-8 फीसदी फेसबुक यूज़र्स फर्जी हैं जबकि इंडस्ट्री अनुमान के अनुसार यह संख्या तीस फीसदी तक हो सकती है। ऐसे गुमनाम यूज़र्स फेसबुक के प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल अपराध, ड्रग्स बिक्री, रेव पार्टी, महिला उत्पीड़न, चाइल्ड सेक्स एवं आतंकवाद के लिए करते हैं। इनसे निपटने के लिए फेसबुक द्वारा शिकायत अधिकारी की नियुक्ति सात समुद्र पार आयरलैंंड में की गई है। फेसबुक द्वारा अपने यूज़र्स के डाटा को अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचने के अलावा सामरिक सूचनाओं को अमेरिकी खुफिया एजेंसियों से भी साझा करने के प्रमाण आए हैं, जिनकी पुष्टि स्नोडेन के खुलासे से हुई है। राष्ट्रीय सुरक्षा के विरुद्ध काम कर रही ऐसी कंपनियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई में भारत सरकार की विफलता से ही एंड्रीसन जैसे लोग भारत को गुलाम मानसिकता से देखते हैं।

पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल भारतीयों को अयोग्यता के नाम पर आजादी देने के खिलाफ थे। श्रेष्ठता और नस्लवाद के आधार पर एंड्रीसन जैसे उनके अनुयायी भारत को आज भी आदिम बाजार के तौर पर ही देखते हैं। फेसबुक द्वारा फ्री बेसिक्स के लिए बताए जा रहे 38 देशों में जाम्बिया, घाना, बोलिविया जैसे अधिकांशतः पिछड़े देश हैं, जिनके साथ भारत की गिनती होने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के डिजिटल इंडिया और मेक इन इंडिया कार्यक्रमों का मजाक ही बनता है।

दूसरी ओर चीन सरकार ने फेसबुक के लिए अपने दरवाजे नहीं खोले हैं, क्योंकि चीन अफीम युद्ध के दौरान पश्चिमी साम्राज्यवाद के खतरों की भारत से बेहतर समझ रखता है। यूरोपियन ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह फेसबुक नव-साम्राज्यवाद का अमेरिकी चेहरा है, जिसकी हकीकत ट्वीट के माध्यम से सामने आ ही जाती है। भारत में अवमानना के मुद्‌दों पर बहस करने वाले नेताओं और भारत सरकार की इस अंतरराष्ट्रीय अपमान पर खामोशी निश्चित ही निराशाजनक है परन्तु भारतीय जनता ने देशव्यापी विरोध कर फेसबुक के साम्राज्यवाद को डिसलाइक तो कर ही दिया है।

- विराग गुप्ता, साइबर कानून के विशेषज्ञ

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