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नई परिस्थितियां और नए अवसर

7 वर्ष पहले
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महाराष्ट्र में अब सर्वथा नई परिस्थिति है। कांग्रेस वर्चस्व का युग समाप्त होने के बाद से राज्य की राजनीति दो ध्रुवों कांग्रेस (बाद में कांग्रेस-एनसीपी) और शिवसेना-भाजपा के बीच बंटी रही। मगर अब पहली बार ऐसा हो रहा है, जब विधानसभा चुनाव में वास्तव में चार-कोणीय मुकाबला होगा, जिसे कुछ क्षेत्रों में राज ठाकरे की महाराष्ट्र नव-निर्माण सेना पांच-कोणीय भी बना देगी। कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र हैं, लेकिन अतीत में वहां कांग्रेस परंपरा (अथवा धर्मनिरपेक्ष वोटों) की गोलबंदी उनकी जीत के लिए अनिवार्य मानी जाती थी। इसी तरह शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी के असर वाले खास क्षेत्र हैं, किंतु कांग्रेस विरोधी वोटों का ध्रुवीकरण दोनों पार्टियों के उम्मीदवारों की सफलता का सूत्र समझा जाता था। अब 15 अक्टूबर को होने वाले चुनाव में ये चारों पार्टियां (अपने कुछ छोटे सहयोगी दलों के साथ) अलग-अलग जोर-आजमाइश करेंगी। इसका एक परिणाम तो यह होगा कि चुनाव में हिंदुत्व और धर्मनिरपेक्षता के मुद्‌दे निर्णायक नहीं रह जाएंगे, क्योंकि इन दोनों का झंडाबरदार होने का दावा करने वाली एक से ज्यादा ताकतें मैदान में होंगी। दूसरा नतीजा है कि पुराने वोट प्रतिशत के अनुरूप कोई अनुमान लगाना अब कठिन है, क्योंकि बिखरे समीकरणों के बीच दलों का अपना खास समर्थन आधार अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगा। भाजपा के पास अवश्य ही नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का सहारा है, जिससे वह फिलहाल अन्य दलों की तुलना में ज्यादा फायदे की स्थिति में नजर आती है। यह पहलू निर्णायक साबित हुआ तो वह महाराष्ट्र में सबसे बड़ी राजनीतिक धुरी के रूप में उभर सकती है, लेकिन यह कांग्रेस के लिए भी एक अवसर है। हाल के उपचुनावों में भाजपा विरोधी वोटों की गोलबंदी का लाभ उसे मिला है। क्या महाराष्ट्र में वह कथित धर्मनिरपेक्ष मतदाताओं की पहली पसंद बनेगी? ऐसा हुआ तो यह राज्य दोनों राष्ट्रीय दलों के एक और प्रतिस्पर्द्धा स्थल के रूप में उभरेगा। दूसरी तरफ शिवसेना मराठी माणुस की भावना उभार पाई और एनसीपी अपनी विशिष्ट राजनीतिक प्रासंगिकता मतदाताओं को समझा पाई तो राज्य विखंडित राजनीतिक स्थिति की तरफ बढ़ सकता है। बहरहाल, यह तय है कि नई परिस्थितियों ने पार्टियों को नए अवसर दिए हैं। यह दरअसल देश में राजनीति की उभरी नई सूरत का ही नतीजा है।

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