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शेयर बाजार में अभूतपूर्व उछाल

7 वर्ष पहले
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बीएसई सेंसेक्सऔर निफ्टी दोनों अभूतपूर्व ऊंचाइयों पर हैं। सेंसेक्स ने पहली बार 28,000 का आंकड़ा पार किया। यह निर्विवाद है कि शेयर बाजारों में यह उछाल खासतौर पर विदेशी संस्थागत निवेशकों के भारतीय वित्तीय बाजार में बढ़ते भरोसे का परिणाम है। फिर भी इस घटनाक्रम को कुछ हलकों में संदेह से देखा जा रहा है, तो यह भी अस्वाभाविक नहीं है। ताजा घटनाक्रम के पीछे सबसे प्रमुख वजह वैश्विक स्तर पर नकदी की बढ़ी उपलब्धता को बताया गया है। अमेरिका में अधिक मुद्रा छापने की नीति वापस ली जा रही है, लेकिन बैंक ऑफ जापान ने 80 खरब येन (तकरीबन 700 अरब डॉलर) के अतिरिक्त बॉन्ड खरीदने की नीति घोषित कर दी है। साफ है, फिलहाल अंतरराष्ट्रीय बाजार में मुद्रा की आसान उपलब्धता बनी रहेगी। नरेंद्र मोदी सरकार बनने की संभावनाओं के साथ ही भारत में उदार आर्थिक नीतियों को लेकर भरोसा बढ़ने लगा था। नतीजतन, इस वर्ष जनवरी के साथ से निफ्टी-सेंसेक्स में 32 प्रतिशत उछाल आया है। विदेशी संस्थागत निवेशकों ने इस दौरान 60,000 करोड़ रुपए की इक्विटी खरीदी है, लेकिन इसी दौर में घरेलू संस्थाओं ने 27,000 करोड़ रुपए से अधिक की इक्विटी बेची है। यानी तस्वीर अंतर्विरोधी है, इसीलिए यह सवाल कायम है कि उछाल का यह दौर कब तक रहेगा? चिंता इसलिए है, क्योंकि वास्तविक अर्थव्यवस्था में सुधार के मजबूत लक्षण अब तक नहीं दिखे हैं। नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च ने इस वित्त वर्ष में आर्थिक वृद्धि दर 5.7 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाने के बाद अब इसे घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया है। निर्यात, व्यापार घाटे और राजकोषीय घाटे के मोर्चों पर तस्वीर धुंधली है। यूरोप के पांच वर्ष के भीतर तीसरी मंदी से ग्रस्त होने की आशंकाओं ने वैश्विक माहौल को निराशाजनक बना रखा है। चीन और जापान से भी आर्थिक खबरें बेहतर नहीं हैं, जो भारत के व्यापार के सहयोगी हैं। ऐसे में कंपनियों का वास्तविक बाजार और मुनाफा बढ़ने को लेकर आशंकाएं बने रहना लाजिमी ही है। इसके बावजूद कंपनियों के शेयरों के भाव बढ़ रहे हैं, तो सवाल उठेगा ही कि कहीं ये उछाल एक बार फिर बन रहे बुलबुलों का नतीजा तो नहीं है? जाहिर है, निजी निवेशकों के लिए सतर्क रहने की जरूरत है।

सादगी सरलता अच्छे जीवन की कुंजियां हैं और फिर भी इन्हें अपनाना बहुत जटिल है। -जिन क्वोन, मार्शल आर्ट गुरु, दक्षिण कोरिया

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