चीन के साथ सहयोग संघर्ष का रिश्ता
भारत, अमेरिका और चीन तीनों के रिश्तों में सहयोग, स्पर्द्धा और संघर्ष के तत्व विद्यमान हैं। आज हर देश चीन के साथ सहयोग रखने के साथ उसके रवैये में अचानक आने वाले विरोधी रुख के लिए तैयारी रखने की रणनीति अपनाई है। यही भारत को करना होगा।
बराकओबामा की भारत यात्रा के ठीक पहले ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूट की तन्वी मदान ने लिखा, ‘आज भारत अमेरिका दोनों के चीन से ऐसे रिश्ते हैं, जिसमें सहयोग, स्पर्द्धा और संघर्ष के तत्व हैं। हालांकि, दोनों रिश्तों में इन तत्वों का स्तर भिन्न है।’ प्रत्येक देश चीन के साथ रिश्ते में मिला-जुला रवैया रखता है। उसके साथ सहयोग बढ़ाने के साथ चीन के रवैये में खराब मोड़ के लिए तैयारी। चीन की रणनीति में हर कोई अपनी भूमिका देख रहा है। चीन को अच्छे रिश्तों का संकेत तो हर कोई देना चाहता है पर कोई उसे उकसाना नहीं चाहता।
इसके बावजूद चीन के प्रति रवैये में फर्क तो आया है। ओबामा के राष्ट्रपति बनने के बाद विश्लेषक कहने लगे थे कि अमेरिका-चीन मिलकर दुनिया चलाएंगे। अब एेसी बात नहीं है। चीन अब अपने रास्ते पर पूरे आत्म-विश्वास के साथ चल रहा है और शेष दुनिया के लिए उसके रवैये में कुछ-कुछ अवमानना दिखाई देती है। देंग शियाओपिंग के बाद शी जिनपिंग ही ऐसे नेता है, जिन्होंने इतनी ताकत हासिल कर ली है। चीन के आधिकारिक मीडिया से हर दूसरे दिन पश्चिमी मूल्यों की बजाय सामजावादी मूल्यों पर दृढ़ रहने की नसीहत दी जाती है। विश्वविद्यालयों के अध्यापकों पर जासूसों की निगाह रहती है कि वे वामपंथी विचारधारा पर कायम रहें। चीन के शिक्षा मंत्री नेे हाल में विश्वविद्यालयों को कड़ी चेतावनी दी थी कि वे चीन के नेताअों राजनीतिक व्यवस्था की आलोचना क्लासरूम से बाहर रखें। पाठ्यपुस्तकों में पश्चिमी मूल्यों को तरजीह दें।
बीजिंग ओबामा की भारत यात्रा के नतीजों को लेकर कुछ चिंतित था। मोदी और ओबामा ने भी दक्षिण चीनी समुद्र में पड़ोसियों को उकसाने की आलोचना कर चीन की दुखती रग पर हाथ रख दिया। इतना ही नहीं दोनों ने भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका को मिलाकर सुरक्षा नेटवर्क को पुनर्जीवित करने की बात तक कह डाली। हालांकि, संयुक्त बयान को बारीकी से पढ़ें तो आपके ध्यान में आएगा कि दोनों की देशों की भिन्न मांगों को जबर्दस्ती एक सूत्र में पिरोने की कोशिश की गई है।
जाहिर है अमेरिका और भारत की एक-दूसरे की अपेक्षाओं में बहुत फर्क है। उनके लिए भारत, चीन से दूरी बढ़ाने का जोखिम नहीं ले सकता। इस आशय का संदेश उसने चीन को दिया है और चीन ने भी उस पर राहत महसूस की है। भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की चीन यात्रा के दौरान उनका जैसा स्वागत हुआ, उससे लगता है कि उसने भी भारत की सफाई को स्वीकार कर लिया है। जैसा कि तन्वी मदान ने लिखा है कि चीन के साथ सहयोग तरक्की के रिश्तों की कामना रखने के साथ उसमें आने वाले खराब मोड़ के लिए तैयारी रखना ही बेहतर राजनयन होगा।
लेखकप्लेनवर्ड्स मीडिया के एडिटर इन चीफ हैं। plainwordseditor@gmail.com