एचएसबीसी से काले धन के नए सुराग
स्विट्जरलैंड सहित किसी बाहरी देश में खाता रखना अवैध नहीं है। अतः यह संभव है कि ब्रिटिश बैंक एचएसबीसी की स्विट्जरलैंड शाखा में जिन लोगों ने खाते रखे, उन्होंने भारतीय कानून के तहत कर चुकाने के बाद उनमें धन जमा कराया हो। फिर भी इन खातों को लेकर गहरा संदेह पैदा हुआ है तो इसकी वजह एचएसबीसी बैंक का संदिग्ध व्यवहार है। 2005 में यूरोपियन सेविंग्स डायरेक्टिव जारी हुआ, जिसमें स्विस बैंकों से कहा गया कि तमाम अघोषित धन पर वे टैक्स लें और उसे खाताधारी के देश को भेज दें। किंतु इस निर्देश का पालन करने की बजाय एचएसबीसी ने अपने खाताधारकों को पत्र लिखकर उस टैक्स से बचने के उपाय सुझाए। यानी उसने कर चोरी में मदद की। एक बैंक के लिए ऐसा व्यवहार कितना जायज है, यह सोचने की बात है। तकरीबन 50 मीडिया घरानों की जांच-पड़ताल से इस बैंक में रखे गए 203 देशों के लगभग एक लाख लोगों के खातों का विवरण सामने आने के बाद एचएसबीसी ने सफाई दी है कि अब वह नियमों और खातों संबंधी पारदर्शिता का पूरी तरह पालन कर रहा है, लेकिन उस बैंक में 2013 तक काम करने वाली एक कर्मचारी ने एक ब्रिटिश टीवी चैनल से कहा कि एचएसबीसी में कर चोरी संबंधी दिक्कतें अभी भी हैं। बैंक जो कहता है, उस पर पालन नहीं किया जाता। गौरतलब है कि बैंक के कंप्यूटर विभाग में काम करने वाले कर्मचारी हर्व फालसियानी ने 2007 में बैंक के दस्तावेज चोरी-छिपे उठा लिए और बाद में उसे कुछ मीडिया घरानों को दे दिया। उससे ही एचएसबीसी की स्विस शाखा के खाताधारकों का खुलासा हुआ। इसी आधार पर यूबीएस सहित अन्य स्विस बैंकों ने धनी अमेरिकियों की संपत्ति छिपाने में उनकी भूमिका को लेकर अमेरिका के साथ समझौता किया है। फ्रांस में जांचकर्ताओं ने पाया कि फ्रेंच खाताधारकों में से 99.8 फीसदी ने संभवतः कर चोरी की थी। फ्रेंच अधिकारियों ने ही 2011 में 628 खाताधारक भारतीयों के नाम भारत सरकार को सौंपे थे। उनके बारे में जांच जारी है। ताजा खुलासों से ऐसे पुष्ट भारतीयों की संख्या 1,195 तक पहुंच गई है, जिनके नाम पर लगभग 25,420 करोड़ रुपए जमा हैं। स्पष्टतः इन सबकी प्रतिष्ठा दांव पर है। इसलिए बेहतर होगा कि वे खुद अपने धन के स्रोत और टैक्स संबंधी जानकारी सार्वजनिक कर दें। वरना ये अपेक्षा सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त विशेष जांच दल से रहेगी कि वह यथाशीघ्र यह पता लगाए कि जमा धन कहीं काली करतूत की कमाई तो नहीं है।
संपादकीय
}बात पते की
Ãजीवन केप्रति जिस व्यक्ति की कम से कम शिकायतें हैं, वहीं इस जगत में अधिक से अधिक सुखी है। -प्रेमचंद