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अपने काम को अपना 100 फीसदी दो, फिर देखो बदलाव

6 वर्ष पहले
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‘चक देइंडिया’ का कबीर खान आपको याद होगा। लेकिन इस कोच की स्थिति तो ‘चक दे इंडिया’ के शाहरुख खान (कबीर) से भी खराब थी। यह कहानी है कोच एमके प्रजीशा की। उन्होंने वॉलीबॉल खूब खेली है और नेशनल गेम्स में सात साल तक अपने राज्य केरल का प्रतिनिधित्व भी किया। पर उन्हें इसका कोई अंदाजा नहीं था कि ‘बीच वॉलीबॉल’ कैसे खेलते हैं। उनसे अचानक कह दिया गया कि केरल में होने वाले नेशनल गेम्स में राज्य की बीच वॉलीबॉल टीम की कोच भी वही होंगी। उन्होंने तुरंत खेल की रूल बुक डाउनलोड की। उसे पढ़ने के बाद राहत की सांस ली कि सिर्फ नियम ही अलग हैं, खेल की टेक्नीक और स्किल तो वही हैं।

हालांकि वे जानती थीं कि खुद को साबित कर सकती हैं। लेकिन जैसे ही वह दफ्तर पहुंचीं, उन्हें धक्का लगा। क्योंकि वहां उन्हें बताया गया कि बीच वॉलीबॉल के लिए कोई टीम ही नहीं है। उन्होंने ओपन ट्रायल बुलाए। सिर्फ 10 ने एप्लाई किया और सलेक्शन के दिन सिर्फ 6 लड़कियां आई। वॉलीबॉल खिलाड़ी से कोच बनी प्रजीशा ने खुद से एक वादा किया- ‘अभी ना पूछो हमसे मंजिल कहां है, अभी तो हमने चलने का इरादा किया है। ना हारे हैं ना हारेंगे कभी, ये किसी और से नहीं खुद से वादा किया है।’

प्रजीशा के सामने सिर्फ छह खिलाड़ी थे। किसी का चयन नहीं करने का तो सवाल ही नहीं था। उन्होंने 22 दिसंबर, 2014 को कालिकट बीच पर जीरो से शुरुआत की। वक्त कम था। फरवरी के पहले सप्ताह में खेल शुरू होने थे। प्रजीशा ने प्रैक्टिस शुरू करने से पहले केरल की समृद्ध संस्कृति का खयाल रखा था। इस अंतरराष्ट्रीय खेल का टू-पीस में खेला जाना उनके लिए सबसे बड़ी चिंता बन गया था। उन्होंने इसका भी तरीका निकाला। शॉर्ट्स की लंबाई कुछ इस तरीके से सेट कराई कि खिलाड़ियों को खेलने में भी दिक्कत हो और लोगों का ध्यान खेल पर ही रहे, कम कपड़े पहने लड़कियों पर नहीं।

इन छह में से ही एक खिलाड़ी थी शाहना। मछुआरे की बेटी। बीच उसकी जिंदगी का हिस्सा थे। वह बीच पर ही दौड़ती, उछलती-कूदती बड़ी हुई थी। यहां तक कि उसे गिरने-पड़ने का भी डर नहीं था। प्रजीशा का ध्यान हमेशा शाहना पर रहा। और उन्होंने शाहना को ब्लॉकर बना दिया। प्रजीशा ने हर खिलाड़ी की भूमिका उसकी मजबूती के हिसाब से तय की। हर खिलाड़ी ने खूब गलतियां की और उनसे सीखा।

बालू और हवा खेल की सबसे बड़ी बाधा थी। बालू पर एक घंटे खेलने का मतलब होता है, साधारण जमीन पर तीन घंटे का खेल। फिर नंगे पैर खेलना दूसरी बड़ी बाधा थी। प्रजीशा ने अपना और अपनी टीम का मनोबल ऊंचा रखा। टूर्नामेंट शुरू हुआ। उन लड़कियों के लिए लाइव मैच देखना पहला अनुभव था। उन्होंने मैच देखे, सीखा और अपने खेल में सुधार किया। उन्हें खेल की थियरी तो मालूम थी, बस प्रैक्टिकल टूर्नामेंट के दौरान हुआ।

खिलाड़ियों में स्वाभाविक लय थी, क्योंकि जिशा, अश्वथी और शाहना केरल स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड में साथ-साथ काम करती थीं। कोर्ट पर उनकी अच्छी जोड़ी बन गई थी। अश्वथी का मजबूत खेल और शाहना का तीखापन एक साथ गया और दोनों की अच्छी साझेदारी बन गई। हर बीतते दिन के साथ नौसिखियों की यह टीम मजबूत होती गई। मनोबल से भी और अपने खेल से भी। अंतत: 5 फरवरी को केरल की टीम इकलौती ऐसी टीम थी, जिसने दो मेडल जीते। स्वर्ण और कांस्य।

फंडा यह है कि

आपकिसी दूसरे से कुछ करने का वादा मत कीजिए। खुद से वादा कीजिए कि अाप हर काम को अपना 100 फीसदी देंगे। फिर देखिए बदलाव।

raghu@dainikbhaskargroup.com