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कांग्रेस के पतन की कीमत पर अाप की जीत

6 वर्ष पहले
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आखिर भाजपा का विजयी रथ सिर्फ दिल्ली में आकर रुका बल्कि पूरी तरह बिखर गया है। ‘आप’ ने 70 में से 67 सीटें जीतकर स्तब्ध करने वाली जीत दर्ज की है। भाजपा को 32 फीसदी वोट के साथ सिर्फ 3 सीट मिली है। 2013 के विधानसभा चुनाव की तुलना में ‘आप’ को 39 सीटों के फायदे के साथ उसका वोट प्रतिशत 22 तक पहुंचा। वोटों में भाजपा की हिस्सेदारी में डेढ़ फीसदी की मामूली कमी आई, लेकिन लोकसभा चुनाव की तुलना में उसे करीब 12 फीसदी वोट कम मिले। यह सही है कि लोकसभा विधानसभा चुनाव में मतदान भिन्न तरीके से होता है, फिर भी विश्वास नहीं होता कि जो पार्टी मुश्किल से आठ माह पहले 60 विधानसभा क्षेत्रों में हावी रही थी, उसका इस बार सफाया ही हो गया। ऐसे कैसे हुआ कि अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी से 13 फीसदी वोटो से आगे रही पार्टी पिछड़ गई?

जहां यह सही है कि लोकसभा चुनाव की तुलना में भाजपा का वोट प्रतिशत एकदम नीचे आया है, लेकिन नतीजे बताते हैं कि ‘आप’ को चुनावी सफलता कांग्रेस के पतन की कीमत पर मिली है जबकि भाजपा का वोट शेयर लगभग वही है, जो इसका 2013 में था, लेकिन वोटों में ‘आप’ की हिस्सेदारी 22 फीसदी बढ़ गई। पिछले विधानसभा चुनाव की तुलना में कांग्रेस को 17 फीसदी मतों का नुकसान हुआ है। बसपा या जनता दल जैसे छोटे दलों के और सिकुड़ने का भी ‘आप’ को ही फायदा हुआ।

सारे दलों ने बिजली पानी की दरें घटाने और महिलाओं के लिए अधिक सुरक्षा के वादे किए, लेकिन वास्तव में चुनाव ‘आप’ के मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी अरविंद केजरीवाल पर जनमत संग्रह में बदल गया था। जैसे भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी को प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी बताकर फायदा उठाया था, वही फायदा ‘आप’ को केजरीवाल के नाम पर मिला। ‘आप’ के समर्थन आधार की तुलना में केजरीवाल की लोकप्रियता कहीं अधिक थी। कई मतदाता ऐसे थे, जो ‘आप’ को वोट देना नहीं चाहते थे, लेकिन केजरीवाल को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते थे। हालांकि, मतदान से बहुत पहले ही विभिन्न वर्गों के मतदाताओं का अलग-अलग दलों में ध्रुवीकरण हो गया था, लेकिन मुख्यमंत्री बनने की संभावना को ध्यान में रखते हुए अंतिम क्षणों में बहुत से मतदाताओं ने पाला बदल लिया। एक माह पहले ‘आप’ भाजपा में कड़ी टक्कर थी। भाजपा थोड़े फायदे में नजर आती थी, लेकिन मतदान के दिन तक फर्क खत्म होता गया और केजरीवाल की पार्टी को जबर्दस्त बढ़त मिल गई। भाजपा की कोई रणनीति काम नहीं आई।

किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी बनाने का तो उल्टा ही असर हुआ। सिर्फ वे अतिरिक्त समर्थन जुटाने में नाकाम रहीं, बल्कि प्रचार की उनकी शैली ने पार्टी कार्यकर्ताओं समर्थकों को रुष्ट कर दिया। वे खुद भी कृष्णा नगर से हार गईं। पिछले चुनाव बताते हैं कि महिला वोट बैंक जैसी कोई चीज नहीं है। उनके वोट विभिन्न दलों में बिखर जाते हैं। बेदी को लाकर महिला सुरक्षा का मुद्‌दा बनाकर भाजपा ने महिलाओं के वोट हासिल करने की कोशिश की, जो नाकाम रही। बेदी की नाकामी भांपकर भाजपा ने बड़ी संख्या में केंद्रीय मंत्री, राज्यों के मुख्यमंत्री अन्य नेता प्रचार में झोंक दिए पर उसके प्रभाव को लेकर अनिश्चतता के कारण अंतत: केजरीवाल के खिलाफ आक्रामक नकारात्मक प्रचार शुरू हो गया। ‘आप’ का रवैया सकारात्मक रहा। भाजपा की भारी पराजय के पीछे उसकी यही नकारात्मकता देखी जा सकती है।

धनी लोगों की पार्टी होने की भाजपा की छवि ने गरीब निम्न वर्ग के मतदाताओं को ‘आप’ के पक्ष में ध्रुवीकृत कर दिया। पिछले चुनाव में भी ऐसा ध्रुवीकरण था, लेकिन इस बार यह बहुत अधिक हो गया। भाजपा को उच्च मध्यवर्ग के वोट मिले जबकि कांग्रेस के निम्न वर्ग के समर्थक ‘आप’ की ओर तो मध्यवर्ग के समर्थक भाजपा की ओर चले गए। हालांकि, यह कहना गलत होगा कि गरीबों निम्न वर्गों ने ही ‘आप’ को जीत दिलाई। उसे मध्य और उच्च वर्ग के वोट भी बड़ी संख्या में मिले। पहली बार वोट देने वाले युवा वर्ग ने बड़ी संख्या में ‘आप’ को समर्थन दिया।

आम आदमी पार्टी को 11 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं का भी समर्थन मिला, जो 7-8 सीटों पर चुनाव का रुख बदलने में सक्षम थे। पहले यह वोट ‘आप’ कांग्रेस में बंटा हुआ था। मुस्लिमों ने पिछले चुनाव में ‘आप’ का रुख किया होता तो इस चुनाव की जरूरत ही नहीं पड़ती। 2014 के आम चुनाव में उन्होंने ‘अाप’ को ऐसा समर्थन दिया था, लेकिन तब भाजपा को पंजाबी खत्री, जाट, ओबीसी और अन्य जातियों में मिले जबर्दस्त समर्थन के कारण मुस्लिमों का ‘अाप’ की ओर जाना बेअसर रहा।

दलितों ने बड़ी संख्या में ‘आप’ को वोट दिया, लेकिन उनमें भी उच्च मध्य वर्ग के दलित भाजपा के पक्ष में रहे। यही वजह रही कि ‘आप’ दलितों के लिए आरक्षित सारी सीटें जीतने में कामयाब रही। पंजाबी भाजपा के प्रति वफादार रहे पर उतना पर्याप्त नहीं था। भू-अधिग्रहण अध्यादेश का विपरीत असर हुआ, क्योंकि उत्तरप्रदेश हरियाणा में जमीन संबंधी हित रखने वाले जाट कुछ सीटों पर प्रभावी संख्या में थे। उन्होंने ‘आप’ को वोट दिया। मैं इसे नरेंद्र मोदी की हार से भाजपा की ज्यादा बड़ी हार कहूंगा। भाजपा ने इसमें सबकुछ झोंक दिया था। प्रधानमंत्री ने पांच रैलियां संबोधित कीं। भाजपा नेतृत्व का एक बड़ा वर्ग इसमें लग गया। वह भी ऐसी पार्टी को हराने के लिए, जिसकी कुछ माह पहले तक एक आदमी की पार्टी कहकर आलोचना की जाती थी। भारत के चुनावी इतिहास में शायद ही ऐसी मिसाल हो कि कोई पार्टी जबर्दस्त समर्थन हासिल होने के सिर्फ आठ माह बाद इस तरह पराजित हो जाए। यह किस तरह की लहर थी, बताया नहीं जा सकता। इस लहर ने 1977 की जनता लहर, 1984 की कांग्रेस लहर, 1989 की वीपी सिंह की लहर या 2010 की बिहार में नीतीश कुमार की लहर कोे भी पीछे छोड़ दिया है। हमें ऐसे चुनाव के लिए कोई दूसरा नाम गढ़ना होगा।

(लेखकदिल्ली स्थित सीएसडीएस के डायरेक्टर हैं)

संजय कुमार