दो बातों पर यकीन दिलाना था, दिला दिया
‘आप’ के प्रचार को समझना है तो यह देखना होगा कि उसके विरोधियों ने कैसा प्रचार किया। नरेंद्र मोदी, किरण बेदी, भाजपा का कुल प्रचार और कांग्रेस का प्रचार ऐसा था, जो ‘आप’ को मददगार रहा। ‘आप’ को सिर्फ दो बातों पर यकीन दिलाना था। एक तो यह कि 49 दिन की सरकार में उन्हें लोगों ने दूसरों के मुकाबले बहुत कम वक्त दिया। दूसरा, सरकार से हटना गलती थी। ये दोनों सफाई उसने अच्छी तरह दी और लोगों को उस पर यकीन गया। उसके बोलने से ज्यादा भाजपा कांग्रेस के बोलने का असर हुआ। लोगों को लगा कि नहीं, ‘आप’ को पूरा मौका देना होगा। इस मामले में ‘आप’ ने बड़ी चतुराई से अपना दांव खेला। फिर उसने कभी नरेंद्र मोदी पर हमला नहीं किया। यहा काम कांग्रेस ने किया चाहे उनके सूट को लेकर, उनकी शैली को लेकर और यह सब ‘आप’ के पक्ष में गया। सूट का मसला हर जगह पहुंचा कि अमीर की पार्टी कौन-सी है, गरीब की पार्टी कौन-सी है। ‘आप’ के प्रचार की तीसरी चीज ज्यादा होशियारीभरी थी कि उसने कभी नकारात्मक प्रचार नहीं किया। मोदी पर हमले की बात हो, भाजपा की खामियां हो। इसकी बजाय उन्होंने काफी मेहनत से अपना सकारात्मक एजेंडा तय किया। उसने अलग-अलग क्षेत्रों में संवाद आयोजित किए। उसी के आधार पर घोषणा-पत्र बनाया और अपना प्रचार बिजली, पानी अन्य ऐसे मुद्दों पर फोकस रखा, जो दिल्ली को रास आते थे। ग्लोबलाइजेशन के बाद से सरकार ने इन सारे क्षेत्रों से हाथ खींच लिया है, लेकिन बजट बढ़ता ही गया है। ‘आप’ ने बताया कि वह बजट का कैसे योग्य उपयोग करेगी। मीडिया के बारे में कभी निगेटिव नहीं कहा। पिछले विधानसभा चुनाव में यह बात थी और लोकसभा चुनाव में तो वे मीडिया को दलाल ही कहते थे। इसका उन्हें लाभ हुआ। मीडिया अंतत: उनके पक्ष में हो गया। जो मीडिया उनके खिलाफ गया, उनकी खुद की रैटिंग कम हो गई। जो आरोप लगे उनके व्यवस्थित जवाब दिए।
(लेखक दिल्ली स्थित राजनीतिक विश्लेषक हैं।)
अरविंद मोहन