समानता की दिशा में सुधार
भारतीय संविधानने उचित ही अलग-अलग मजहबों को विवाह, उत्तराधिकार, रस्म-रिवाज आदि जैसे मामलों में निजी कानूनों के मुताबिक चलने की अनुमति दी है, लेकिन इसमें यह अपेक्षा निहित है कि धीरे-धीरे इन कानूनों को बराबरी और इंसाफ के तकाजों के मुताबिक विकसित किया जाएगा। लैंगिक न्याय (यानी पुरुष और महिलाओं को समानता के धरातल पर लाना) ऐसा मुद्दा है, जिसका किसी खास महजब के लिए किए गए विशेष प्रावधानों के साथ टकराव खड़ा होता रहा है। एक ऐसे ही मामले में अब विधि आयोग ने सुधार की सिफारिश की है। मामला भारतीय उत्तराधिकार कानून-1925 की ईसाई समुदाय से संबंधित धाराओं का है। निर्विवाद रूप से ये धाराएं परिवार में महिला के दर्जे को दोयम बनाती हैं। मसलन, इनके तहत प्रावधान है कि अगर बिना वसीयत लिखे बेटे की मृत्यु हो जाए और उसका कोई बेटा-बेटी या पोता-पोती हो, तो उसकी विधवा का हिस्सा निकालने के बाद उसकी बाकी संपत्ति उसके पिता को मिलेगी। उसमें उसकी मां का कोई हिस्सा नहीं होगा। पिता की मृत्यु हो चुकी हो और मां जीवित हो, तब भी माता को इस संपत्ति में से मृत व्यक्ति के भाई और बहनों को हिस्सा देना होगा। वसीयत लिखे जाने की स्थिति में माता को बेटे की पूरी संपत्ति तभी मिल सकती है, जब मृतक का कोई वंशानुगत उत्तराधिकारी, पिता, भाई-बहन आदि में से कोई हो। आयोग ने उचित ही कहा है कि परिवार में ‘पुरुष को प्राथमिकता देने का यह दृष्टिकोण ईसाई महिलाओं के प्रति अन्यायपूर्ण और अनुचित है।’ अतः इन धाराओं में संशोधन महिला अधिकारों के हक में होगा। केंद्र सरकार को बिना हिचक दिखाए इस दिशा में पहल करनी चाहिए। अपेक्षित यही है कि यह कार्य ईसाई समुदाय की सहमति से हो। इसके लिए हर आवश्यक स्तर पर संवाद बनाया जाना चाहिए। अगर आपसी विश्वास का माहौल बन सके तो टकराव की गुंजाइश नहीं रहेगी। और ऐसा हो पाया, तो उससे दूसरे समुदायों की महिलाओं को भी न्याय दिलाने के पक्ष में माहौल बनेगा। आजादी के बाद हमारे राष्ट्रीय नेतृत्व ने हिंदू महिलाओं के हक में युगांतरकारी कानून बनाए। अब आवश्यकता उस लाभ को दूसरे समुदायों की महिलाअों तक पहुंचाने की है। विधि आयोग के सुझाव इसी दिशा में हैं।
यदि नहीं जानते कि आप कहां जा रहे हैं तो कोई एक राह पकड़ लीजिए, सही जगह पहुंच जाएंगे। -लुइस कैरॉल, ब्रिटिश साहित्यकार
बात पते की
संपादकीय