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अनजान ड्राइवरों के हाथों में बचपन

7 वर्ष पहले
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दिल्लीमें विदेशी कंपनी की टैक्सी सेवा में युवती से दुराचार की घटना ने हमारी परिवहन प्रणाली पर गंभीर सवालिया निशान लगा दिया है। हालांकि, इस पर अंगुली पहली बार नहीं उठ रही है बल्कि दो साल पहले ठीक इसी महीने में दिल्ली में ही चलती बस में युवती, जिसे हमने निर्भया नाम से जाना, के साथ ऐसी ही बर्बर घटना घट चुकी है। उसके बाद देशभर में गुस्सा उमड़ा। सरकार ने तंत्र में सुधार का इरादा ज़ाहिर किया, लेकिन उससे कोई तब्दीली नहीं आई। पहले स्थानीय निजी कंपनी की बस थी तो अब विदेशी कंपनी के तहत काम कर रही देसी टैक्सी। यानी देश में किसी भी सेवा की कोई गारंटी नहीं है। विदेशी कंपनियों से नियम-कायदों के प्रति सख्ती की अपेक्षा रहती है, वे भी हमारे कानूनों के झोल का भरपूर फायदा उठा रही हैं।

ऐसे में अगर हम मौजूदा खतरों के बारे में सोचेंगे तो दिल दहल जाएगा। हर बड़े शहर में बड़ी तादाद में टैक्सियां बसें रोज दौड़ रही हैं। निजी क्षेत्र के विस्तार ने कानून को ज्यादा शिथिल और इसे लागू कराने वाले तंत्र को अधिक स्वच्छंद बना दिया है। सड़कों पर दौड़ रहे सार्वजनिक परिवहन के वाहनों को कौन लोग चला रहे हैं और उनमें सुरक्षा के कितने साधन हैं, यह देखने वाला कोई नहीं है। हैरत की बात है कि हर दिन मासूम बच्चों को स्कूलों तक ढोने वाले कैब और बसों के चालक-परिचालकों की कैफियत भी नहीं रखी जाती। परिचालन के मापदंडों की फिक्र नहीं की जाती। परिवहन विभाग को चिंता है और ही पुलिस को इन्हें देखने की फुर्सत।

स्कूली बसों कैब के मामले में तो वे जितने ग़ैर जिम्मेदार हैं उतने ही गैर जवाबदेह स्कूल संचालक हैं। वे भी तो अपने चालक-परिचालकों के प्रति अपेक्षित सजगता रखते हैं और ही अभिभावक की चिंता से उनका सरोकार होता है। कुछ स्कूल तो अभिभावक से यह शपथ-पत्र भी ले लेते हैं कि बच्चे के स्कूल से घर जाने तक उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं होगी, जबकि वे चाहें तो बच्चों अभिभावक के बीच कड़ी बन सकते हैं। यहां तक कि जिलों के शिक्षा विभागों तक के पास यह जानकारी नहीं मिलेगी कि स्कूली बसों को चलाने वाले कितने प्रशिक्षित हैं और उनका ट्रैक रिकॉर्ड क्या है। उल्टे, इन पर सख्ती की जाती है तो निजी संस्थाएं संगठित होकर आंदोलन पर उतारू तक हो जाती हैं, इसलिए स्कूली बच्चों को लाने-ले जाने वाली गाड़ियां भी गाहे-बगाहे दुर्घटना की शिकार ही नहीं होतीं, बच्चों