कर दरों से ज्यादा छेड़छाड़ न हो
यशवंत सिन्हा
पूर्व केंद्रीय वित्त एवं विदेश मंत्री
अब तक तो वित्त मंत्रालय में बजट की कवायद पूरी होने ही वाली होगी, इसलिए बजट पर वित्त मंत्रालय को कोई सलाह देने में कुछ देर हो चुकी है। फिर भी आगामी बजट को लेकर मैं अपने विचार रख रहा हूं। पांच वर्ष के लिए चुनी हुई सरकार को पांच नियमित बजट पेश करने का मौका मिलता है। एनडीए सरकार पहले ही दो नियमित बजट पेश कर चुकी है। यदि हम यह बात ध्यान में रखें कि पांचवां बजट चुनाव के ठीक एक वर्ष पहले पेश किया जाएगा, तो कह सकते हैं कि उससे कोई मूलगामी परिवर्तन लाने की अपेक्षा नहीं रखी जा सकती। ऐसे में तीसरा बजट इस सरकार के लिए सबसे महत्वपूर्ण बजट है। कह सकते हैं कि यह देश को लैंडमार्क बजट देने का इसके पास आखिरी अवसर है।
विश्व परिदृश्य कहीं से भी प्रोत्साहित करता नज़र नहीं आता। यूरोप लगातार आर्थिक संकट की वेदना झेल रहा है। सारी कोशिशों के बाद भी जापान की वृद्धि दर बढ़नेे से इनकार कर रही है। चीन की अर्थव्यवस्था भी धीमी पड़ रही है। अमेरिका से आने वाली कोई भी अच्छी खबर भारत के लिए बुरी खबर बन जाती है, क्योंकि इससे भारत से अमेरिका की ओर डॉलर का उलटा प्रवाह शुरू हो जाता है। उम्मीद की एक ही चमकीली रेखा है- कच्चे तेल की गिरती कीमतें। घरेलू परिदृश्य भी समस्याओं से बेजार है। 10 लाख करोड़ की परियोजनाएं ठप पड़ी हैं। बैंकों की फंसी पड़ी संपत्ति बढ़ रही है। घरेलू मांग की हालत भी मजबूत नहीं है और यूपीए वर्षों के दौरान ठहर चुका निवेश-चक्र, पूरी तरह से अब तक नहीं उबरा है। सुधार संबंधी महत्वपूर्ण कानून संसदीय गतिरोध में फंसे पड़े हैं। जहां बजट से वैश्विक समस्याओं के समाधान की उम्मीद तो नहीं की जा सकती वहीं, निश्चित ही इससे उनके विपरीत प्रभावों को घटाने की अपेक्षा जरूर है। जहां तक घरेलू समस्याओं का सवाल है, लोगों को बजट से उनके जवाब मिलने की अपेक्षा रहेगी।
बजट में किसी निश्चित दिशा में विशेष जोर दिया जाना चाहिए। नवंबर के अंत में दिए अपने भाषण में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने आगामी वर्षों में चीन की आर्थिक वृद्धि के लिए पांच ऐसे क्षेत्रों की पहचान की थी। पहला, शहरीकरण। भारत की तरह चीन में भी शहरी आबादी बहुत तेज रफ्तार से बढ़ रही है, जिससे मौजूदा शहरों अौर वहां के अाधारभूत ढांचे पर दबाव बढ़ रहा है। इससे इन शहरों में जगह की मांग बढ़ती जा रही है। दूसरा, सूचना प्रौद्योगिकी पर खास जोर देने के साथ आधुनिक औद्योगीकरण। तीसरा, सूचना, डेटा और इंटरनेट आधारित विकास खासतौर पर टेलीकॉम सेक्टर। चौथा कृषि का आधुनिकीकरण और पांचवां आधारभूत ढांचे का आधुनिकीकरण बावजूद इसके कि चीन में राजमार्गों का दुनिया का सर्वोत्तम नेटवर्क अौर तीव्र गति का रेलवे नेटवर्क है।
विशेष ध्यान दिए जाने के ये पांच क्षेत्र भारत पर भी उतने ही लागू होते हैं। बेशक, कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण अंतर हैं। जहां भारत में नई टाउनशिप बसाना आवश्यक है वहीं, उनके लिए जमीन हासिल करना बड़ी समस्या है। ऐसे में हमारे शहरीकरण में मौजूदा महानगरों व शहरों में सुधार लाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। वहां नगर निकायों की गुणवत्तापूर्ण सेवाएं मुहैया कराई जानी चाहिए, झुग्गियों को हटाया जाना चाहिए और उनके स्थान पर बहुमंजिला अपार्टमेंट खड़े करने चाहिए। इसके साथ उपनगरों को प्रोत्साहन देकर छोटे शहरों व ग्रामीण भागों में आवास सुविधाओं पर जोर देना चाहिए। शहरी लोक परिवहन पर भी तत्काल ध्यान दिए जाने की जरूरत है। वित्त मंत्री को निजी रहवासी आवासों को अधिक आयकर रियायतों पर विचार करना चाहिए।
भारत में बड़े पैमाने पर आधारभूत ढांचा निर्मित करने की जरूरत है। इसमें राष्ट्रीय राजमार्गों को चार लेन में बदलना, कुछ अन्यों को छह लेन का बनाना, प्रादेशिक राजमार्गों की बेहतरी और ग्रामीण सड़कों का बड़े पैमाने पर निर्माण शामिल होना चाहिए। आधारभूत ढांचे के विकास में रेलवे को अपनी भूमिका निभाने योग्य बनाना चाहिए। प्रमुख राजमार्गों के समानांतर मालवाही गलियारे को प्राथमिकता के आधार पर पूरा किया जाना चाहिए। इसी प्रकार और अधिक विमान तल, बंदरगाह और जल मार्ग निर्मित किए जाने की जरूरत है। ठप पड़ी परियोजनाओं को शुरू करने और नए प्रोजेक्ट शुरू करने से अर्थव्यवस्था में निवेश की मांग बढ़ेगी, जिससे संकट का सामना कर रहे इस्पात, सीमेंट व अन्य बिल्डिंग मटेरियल और बिजली जैसे अर्थव्यवस्था के क्षेत्रों को प्रोत्साहन मिलेगा। इसके साथ ही रोजगार भी पैदा होगा, जो बदले में उपभोक्ता वस्तुओं की मांग निर्मित करेगा।
भारतीय कृषि को किसी अन्य वस्तु की बजाय सिंचाई के लिए पानी की सर्वाधिक जरूरत है। हमारी खेती योग्य जमीन का सिर्फ 45 फीसदी ही सिंचित है। इसे ध्यान में रखकर कल्पना की जा सकती है कि यदि शेष 55 फीसदी सूखे क्षेत्रों को सिंचाई के दायरे में लाया जाए तो कैसे क्रांति हो सकती है। मैंने कई बार प्रधानमंत्री सिंचाई योजना के लिए कहीं अधिक आवंटन की गुहार लगाई है। यह कदम जमीनी स्तर पर बहुत परिवर्तन ला सकता है। प्रधानमंत्री और उनके सहयोगियों से मेरी गुजारिश है कि आगामी वर्ष में उन्हें इस योजना के तहत देश के हर ब्लॉक में कम से कम कोई एक प्रोजेक्ट के उद्घाटन के लिए जाना चाहिए। मैंने अपने एक बजट भाषण में कहा था कि पैसा और पानी भारतीय किसान की मूलभूत आवश्यकताएं हैं। इसीलिए सिंचाई के लिए मैंने वाटर शेड डेवलपमेंट प्रोग्राम को राष्ट्रीय मिशन के रूप में शुरू किया था और किसान के वित्त पोषण के लिए किसान क्रेडिट कार्ड योजना शुरू की थी। हालांकि, किसान की जरूरत पूरी नहीं हुई है और हमें इस पर तत्काल ध्यान देना चाहिए।
इस बजट को वह सब करना चाहिए, जो अर्थव्यवस्था में मांग पैदा करने के लिए जरूरी है। इसकी शुरुआत निवेश वाले माल की मांग से होनी चाहिए, जो उपभोक्ता माल की मांग की ओर ले जाएगी। मैं इसके खिलाफ नहीं हूं कि वित्तमंत्री वित्तीय घाटा काबू में लाने की अपने योजना का उल्लंघन करंे बशर्ते राजस्व घाटा मजबूती से काबू में रखा जाए और अतिरिक्त पैसे को उत्पादक उद्देश्यों से खर्च किया जाए। करारोपण के मामले में उन्हें जीएसटी अौर प्रत्यक्ष कर संहिता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता पर फिर जोर देना चाहिए। उन्हें व्यक्तिगत आयकर में रियायत बढ़ाने के अलावा कर की दरों से ज्यादा छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए।
यह ‘लीप ईयर’ (फरवरी 29 दिनों का है) का बजट है। क्या वित्तमंत्री अपने इस बजट के जरिये लीप (छलांग) लेकर देश को उच्च आर्थक वृद्धि दर की राह पर ले जाएंगे?
ysinha2005@hotmail.com (ये लेखक के अपने विचार हैं।)
बजट : 2016-17
बजट से वैश्विक समस्याओं के समाधान की उम्मीद तो नहीं की जा सकती वहीं, निश्चित ही इससे उनके विपरीत प्रभावों को घटाने की अपेक्षा जरूर है।
हमारे शहरीकरण में मौजूदा महानगरों व शहरों में सुधार लाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। वहां नगर निकायों की गुणवत्तापूर्ण सेवाएं मुहैया कराई जानी चाहिए।
इस बजट को वह सब करना चाहिए, जो अर्थव्यवस्था में मांग पैदा करने के लिए जरूरी है। इसकी शुरुआत निवेश वाले माल की मांग से होनी चाहिए, जो उपभोक्ता माल की मांग की ओर ले जाएगी।
वित्त मंत्री के सामने अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने की चुनौती