भारत-इंडिया के फर्क में बिज़नेस संभावना
वह सिर्फ चार साल की है। कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू से 130 किलोमीटर दूर अपने गांव में रहती है। उनके गांव के अधिकांश लोगों ने राजधानी नहीं देखी है, जबकि कई तो दादा-दादी बन चुके हैं। उन्हें इसकी कोई जरूरत नहीं पड़ी, क्योंकि गांव आत्मनिर्भर है और कई पीढ़ियों ने ज्यादा यात्रा किए बिना ही पूरी उम्र निकाल दी। विकास के दौर में पिछले दशक में छोटे व्यापारों ने कई दुकानों के माध्यम से यहां सुविधाएं पहुंचाई। गांव में अच्छी सड़कें हैं। मोबाइल जैसे अाधुनिक संचार साधनों के अच्छे स्टोर हैं। इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की दुकानें मशरूम की तरह उग आई हैं। गांव वाले फैशन स्टोर भी अपना रहे हैं, इसलिए भी 3000 परिवारों वाले इस गांव के लोगों को बाहर की यात्रा करने की बहुत कम जरूरत पड़ती है। बोलचाल में वे सिर्फ कन्नड़ बोलते हैं। इसी मामले में किसान की वह चार साल की बच्ची अन्य से अलग है। वह अपना परिचय निखालिस अंग्रेजी में देती है। उसे अंग्रेजी की कुछ बहुत ही अच्छी कविताएं याद हैं और लगभग सारी बातें अंग्रेजी में समझती लेती हंै।
वह अकेली नहीं है। उसके 12 दोस्त भी ऐसे ही हैं। अगर आप गांव में जाएंगे तो आसानी से अन्य बच्चों के बीच इन 13 को पहचान लेंगे। उसी की उम्र के ये सभी बच्चे हिप्पोकेम्पस लर्निंग स्कूल (एचएलसी) के छात्र हैं, जो उनके गांव में प्री-स्कूल की सुविधार सालाना मात्र 2000 रुपए में उपलब्ध कराती है। एचएलसी ने कर्नाटक के गांवों में ऐसे 17 स्कूल 2011 में खोले थे। अब तेजी से तरक्की करते हुए पूरे राज्य में फैलने के अलावा महाराष्ट्र में भी इसकी शाखाएं हैं। एचएलसी यह बात अच्छी तरह समझता है कि बच्चों में अच्छी आदतें डालने, नई भाषाएं सिखाने, दिमागी और बौद्धिक विकास के लिए प्री-स्कूल एजुकेशन कितनी महत्वपूर्ण है। आज इस स्कूल की शाखाएं कोल्हापुर, सांगली, और नागपुर के आस-पास कई स्थानों पर है। यहां लोगों में अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ाने की इच्छा तो बहुत है, लेकिन भरोसा कम है। वे पहले स्थानीय समुदाय की मदद से गांव से ही अच्छी पढ़ी-लिखी होशियार महिलाओं को चुनते हैं और फिर उन्हें 15 दिन का प्रशिक्षण दिया जाता है, जो छह महीने के मॉन्टेसरी ट्रेनिंग का ही छोटा रूप होता है। एचएलसी ने एक सिस्टम बनाया है, जिसे एटीईपी - (आरंभ, प्रायोगिक, उत्कृष्ट और सर्वोत्कृष्ट) लेवल कहा जाता है। इसमें बच्चों का विश्लेषण होता है और टीचर्स को बच्चों की उन समस्याओं के समाधान के लिए शिक्षित किया जाता है।
एचएलसी में खुद प्री-स्कूल सेंटर्स के लिए सामग्री बनाई है और इसी से प्रशिक्षण दिया जाता है। ऐसे सेंटर शुरू करने के लिए 80 हजार रुपए की जरूरत होती है। टीचर्स के सालाना वेतन को मिलाकर 80 हजार रुपए अन्य खर्च होता है। चूंकि यह ग्रामीण मार्केट की सामाजिक जरूरत की बात है और शहरी क्षेत्रों की कंपनी जैसे ट्रीहाउस और जीकिड की तुलना में अलग होने के बावजूद एशियन डेवलपमेंट बैंक और कई अन्य सीड फंड कंपनियों ने पिछले पांच दौर की फंडिंग में इसमें 2.1 करोड़ डॉलर का निवेश किया है। एचएलसी चार कारणों से सफल है - 1) सेंटर्स सुविधाजनक स्थान पर होते हैं। 2) फन और एक्टिविटी के जरिये शिक्षा की मंशा अच्छी है। 3) स्थानीय महिलाओं को ट्रेनिंग से रोजगार भी पैदा होता है। और 4) बच्चों को अंग्रेजी और उनकी मातृ भाषा की शिक्षा सही तरीके से मिल रही है, जिससे स्थानीय किसान समुदाय इसे समझ पा रहे हैं और अपने बच्चों के विकास पर गर्व महसूस कर रहे हैं। आज एचएलसी के साथ स्कूल आंत्रप्रेन्योर पार्टनर भी हैं। कर्नाटक में 50 स्कूल और महाराष्ट्र में आठ स्कूल पार्टनरशिप में चल रहे हैं। और अब इन स्कूलों में 11 हजार छात्र और 600 प्रशिक्षित टीचर हो चुके हैं। एचएलसी ने मूल समस्या को पहचाना और अपना पूरा बिजनेस सिद्धांत इस बात पर तैयार किया कि ग्रामीण बच्चों को बराबर प्रोत्साहन नहीं मिलता और इसलिए जीवन के शुरुआती दिनों में विकास के बड़े अवसर से वे चूक जाते हैं।
फंडा यह है कि भारत और इंडिया के बीच के अंतर को पाटने का कोई भी बिजनेस सफल और स्थायी होगा, क्योंकि अल्प शहरियों की तुलना में ग्रामीण आबादी बहुत-बहुत ज्यादा है। raghu@dbcorp.in