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डेविड हेडली की गवाही से बदलेगा पाक का रुख?

5 वर्ष पहले
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पाकिस्तानी-अमेरिकी आतंकी डेविड कोलमैन हेडली ने भारतीय अदालत के सामने 26/11 के षड्यंत्र की वही कहानी दोहराई, जिसका खुलासा काफी पहले हो चुका था। फिर भी उसकी गवाही अहम है, क्योंकि अब उस आतंकवादी हमले के पाकिस्तान में बैठे कर्ता-धर्ताओं के नाम तथा उनकी भूमिका ठोस न्यायिक साक्ष्य के रूप में उपलब्ध हैं। किंतु बड़ा सवाल यह है कि भारत इन सबूतों का क्या करेगा? जब अतीत में ऐसे साक्ष्यों और सुरागों के आधार पर पाकिस्तान ने कार्रवाई नहीं की, तो अब वह ऐसा करेगा- इस उम्मीद का कोई आधार नहीं है। गत 2 जनवरी को हुए पठानकोट हमले के तुरंत बाद उसका रुख बदलने की जो आशाएं पैदा हुईं, वे अब धूल-धूसरित हो चुकी हैं। सोमवार को खबर आई कि पाकिस्तान के एक विशेष जांच दल को पठानकोट हमले में ‘जैश-ए-मोहम्मद के हाथ के सबूत नहीं मिले।’ यानी पाकिस्तानी जांचकर्ताओं के लिए वे सुराग महत्वहीन हैं, जो भारतीय एजेंसियों ने उन्हें सौंपे हैं, जबकि इनके आधार पर भारतीय एजेंसियां इस निष्कर्ष पर पहुंची हैं कि पठानकोट हमला जैश ने किया। मगर पाकिस्तानी अधिकारियों का दावा है कि जैश के ठिकानों, मदरसों और उनके दस्तावेजों की जांच में कुछ भी संदिग्ध नहीं पाया गया। पाकिस्तान का यह नज़रिया मुंबई हमले के समय से जारी है, इसीलिए षड्यंत्र का हिस्सा रहे हेडली की जुबानी उस कांड की पूरी कथा भले दुनिया के सामने आई हो, मगर इनसे हाफिज सईद, जकी-उर-रहमान लखवी और आईएसआई तथा पाक सेना के आरोपी अधिकारियों को सज़ा दिलाने की कोई ईमानदार कोशिश होगी, इसकी संभावना न्यूनतम है। हेडली ने बताया कि आईएसआई लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिजबुल मुजाहिदीन जैसे दहशतगर्द गुटों को ‘वित्तीय, सैन्य एवं नैतिक’ समर्थन देती है। उसने आईएसआई के कई अफसरों के नाम भी लिए। पाकिस्तान सरकार का आतंकवाद से लड़ने का इरादा वास्तविक होता, तो उन सबके खिलाफ कार्रवाई करने के लिए वह इस गवाही को काफी मानती। ऐसे ही साक्ष्यों के आधार पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने लश्कर, जैश, हिजबुल आदि को आतंकवादी गुटों की सूची में डाला है। इसके बावजूद पाक सरकार ने हाफिज सईद, लखवी आदि को खुलेआम घूमने की छूट दे रखी है, तो आईएसआई तक कानून के हाथ पहुंचना तो दूर की बात है, लेकिन अब भारत सरकार को हाथ-पर-हाथ धरे नहीं बैठे रहना चाहिए। 26/11 तथा पठानकोट हमले के दोषियों पर प्रभावी कार्रवाई के बिना पाकिस्तान से समग्र वार्ता को आगे न बढ़ाने के रुख पर उसे अडिग रहना चाहिए।

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