- Hindi News
- काका को देख पहली बार बोलीं और मैं बन गई बहन
काका को देख पहली बार बोलीं और मैं बन गई बहन
तीसरी बार देवदासियों को मिलने से पहले मैंने खुद को पारंपरिक भारतीय नारी के अवतार में तैयार किया। बालों को पीछे की तरफ बांधा, फूल सजाए, दो सौ रु. वाली साधारण साड़ी, मंगलसूत्र चूड़ियां पहनीं, बिंदी लगाई और काका को साथ लेकर गई। देवदासियों ने काका को देखा और नमस्कार किया। काका ने उन्हें बताया कि ये मेरी बेटी है। टीचर है। छुटि्टयों में यहां आई है। मैंने इसे यहां के मुश्किल जीवन के बारे में बताया कि कैसे बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के लिए आप देवदासियां अपनी सेहत को नुकसान पहुंचा रही हैं। क्या मैंने ठीक कहा? सब ने हां में जवाब दिया। टीचर होने के कारण यह आपके बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और नौकरी ढूंढ़ने में मदद करेगी।
काका ने आगे कहा- कुछ स्कॉलरशिप के बारे में भी बताएगी जिनसे आपको आर्थिक मदद मिलेगी। अगर आप यह सब नहीं जानना चाहती हैं तो कोई बात नहीं, हम दूसरे गांव में चले जाएंगे। मैं काका को आगे लेकर गई और कहा कि आप उन्हें एड्स के बारे में क्यों नहीं बता रहे हो, यह सब बताने से क्या फायदा है। काका ने जवाब दिया- निगेटिविटी से बात शुरू करोगी तो कोई, कभी नहीं सुनेगा। काका द्वारा कहने के बाद देवदासियां मेरी बात सुनने को तैयार थीं। पहली बार उन्होंने मुझे अक्का (कन्नड़ में बड़ी बहन को कहते हैं।) बुलाया। बातचीत शुरू हुई। मैंने उनके बच्चों को स्कॉलरशिप लेने में मदद की। इन देवदासियों के साथ रिश्ता बनाने में 3 वर्ष लग गए।
इतने वक्त बाद वे मुझे अपना दर्द सुनाने लगीं। हर देवदासी की अपनी अलग दर्दभरी कहानी थी, लेकिन अंत एक ही था- समाज। समाज ही उनकी जिंदगी में शर्मिंदगी भर रहा था और उन्हें इस गंदगी से निकलने नहीं दे रहा था। मैंने देवदासियों के लिए एक संस्था बनाई। लोग जुड़ने लगे। दिल्ली से अभय कुमार आगे आए। मैंने अभय से कहा कि देवदासियों के साथ 8 माह काम करने के बाद फुल-टाइम प्रोजेक्ट में शामिल करेंगे। वे 8 माह बाद लौटा और उसने इसी काम से जुड़े रहने को कहा। मेरे बहुत समझाने पर भी उसने एक सुनी। मैंने स्टाइपेंड के तौर पर कुछ पैसे दिए जिन्हें उसने लेने से इंकार कर दिया और कहा कि सिर्फ रहने को छत, दो वक्त की रोटी और स्कूटर के लिए पेट्रोल चाहिए। अभय का जुनून और हौसला देखकर उसे प्रोजेक्ट लीडर बनाया गया। देवदासियों के बच्चों को स्कूल और कुछ का प्रोफेशनल कोर्स में दाखिला कराया। एड्स अवेयरनेस प्रोग्राम कराए। स्ट्रीट प्ले के माध्यम से बीमारियों के बारे में बताया गया, लेकिन अभय और मेरे लिए जीवन आसान नहीं था। धमकियां मिलने लगीं। सबसे पहले अभय के लिए पुलिस प्रोटेक्शन का इंतजाम किया गया, पर उसने यह कहकर इंकार कर दिया कि मेरी सुरक्षा देवदासियां करेंगी। अब खराब से खराब परिस्थिति में भी देवदासियों ने अच्छा सोचना शुरू कर दिया था। वे इस काम से नफरत करने लगी थीं। उन्होंने गाय- भैंस और बकरियां रखनी शुरू कर दी थीं। हमने उनके लिए नाइट स्कूल बनाए। 12 सालों बाद कुछ महिलाएं मेरे पास आईं और बैंक खोलने की बात कही। यह भी कहा कि अकेले ऐसा करना मुश्किल होगा। उन्हें बैंक के बारे में सही जानकारी नहीं थी। अभय और मैंने उन्हें बैंकिंग के बेसिक समझाए। कुछ प्रोफेशनल्स की मदद से बैंक खोला गया। उन्हें कानूनी और एडमिनिस्ट्रेटिव सहयोग दिया गया।
इस बैंक के एम्प्लाइज़ और शेयरहोल्डर देवदासी ही थीं। कम इंट्रेस्ट पर लोन मिलने लगे। तीन साल में 80 लाख रुपए डिपॉजिट हुए। सबसे अच्छी बात यह थी कि अब तक तीन हजार महिलाएं, देवदासी सिस्टम से बाहर चुकी थीं। बैंक की तीसरी वर्षगांठ पर इन महिलाओं की चिट्ठी मिली। उन्होंने मुझे बैंक की तीसरी वर्षगांठ पर बुलाया था। चिट्ठी पढ़कर खुद पर काबू रख सकी। मुझे याद है कि कैसे पहली बार चप्पल पड़ी थी और अब वे मेरे ट्रेवलिंग का खर्च उठाने को तैयार थीं। मैंने खुद के खर्च पर फंक्शन में आने का प्लान किया। फंक्शन में कोई नेता, फूल-माला या स्पीच नहीं थी। साधारण आयोजन था। कुछ महिलाओं ने जीवन की कहानी सुनाई। कुछ ने बताया कि उनके बच्चे अब डॉक्टर, इंजीनियर बन चुके हैं। उन्होंने मुझे बोलने को कहा। वैसे तो मैं बहुत बोलती हूं, लेकिन उस दिन शब्द नहीं मिल रहे थे। पहली बार मुझे लगा जैसे भगवान से मुलाकात हुई हो। मैंने भगवान से कहा- आपने मुझे बहुत कुछ दिया है। शायद मैं इस तरीके से कुछ आपको लौटा सकी हूं। ये बच्चे आपके फूल हैं जिन्हें मैं लौटा रही हूं। अभय वहीं था। मैंने संस्कृत का एक श्लोक सुनाया जो दादाजी सुनाते थे- महल चाहिए, ही कोई बड़ा पद। दोबारा जन्म लेना चाहती हूं, ही मरकर जन्नत जाना चाहती हूं। कुछ देना चाहते हैं तो नर्म दिल और मजबूत हाथ दें जिनसे दूसरे के आंसू पोंछ सकूं।
यह कहकर मैं अपनी कुर्सी पर लौट आई। एक देवदासी ने मुझे एम्ब्रायडरी वाला बेडस्प्रेड तोहफे में दिया और कहा कि यह बेडस्प्रेड हमारी भावनाओं जैसा है। यह गर्मी में ठंडा और ठंड में गर्म रखेगा। मुश्किल वक्त में आप हमेशा हमारे साथ थीं। यह बेडस्प्रेड मेरे जीवन का सबसे भावनात्मक तोहफा है।