सबकी चुनौती, सबके लिए अवसर
जब सारा देश मोदी सरकार के सौ दिनों का लेखा-जोखा लेने में लगा था और ना-ना करते मोदी के मंत्री भी अपने-अपने विभागों के काम का हिसाब-किताब सार्वजनिक कर रहे थे तब राजनीतिक दलों और जमातों के बीच नई राजनीति की बेचैनी दिख रही थी और इस चीज को वे तरह-तरह से व्यक्त कर रहे थे। यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले वक्त में यह बदलाव हमारी राजनीति और शासन को कितना प्रभावित कर पाते हैं। कई बड़े खिलाड़ियों के निष्क्रिय रहने से बहुत उम्मीद तो नहीं करनी चाहिए पर ये बदलाव सिर्फ हवा में रह जाएंगे यह मान लेना भी गलत होगा, पर इस बदलाव के पीछे कोई बहुत बड़ी और परिवर्तनकारी सोच हो यह भी अभी तक नहीं दिखता। बल्कि इस बदलाव के सूत्रधार भी भरोसे से नहीं बता सकते कि वे सीटें बढ़ाने के सामान्य राजीनीतिक पराक्रम के अलावा कुछ हासिल करना चाहते हैं। जैसे भाजपा को इतना साफ जनादेश मिलने की बात कोई नहीं कह रहा था पर इसका यह भी मतलब है कि लोग बदलाव के लिए बेचैन हैं और शीर्ष नेतृत्व इस बारे में सोच पाने और कर पाने में पूरी तरह सक्षम नहीं है।
नरेंद्र मोदी की जीत तूफानी रही और इसने जाति-संप्रदाय की राजनीति को किनारे किया पर खुद मोदी और भाजपा का अभियान जाति और संप्रदाय की राजनीति से ऊपर उठा हो, यह कहना गलत होगा। मोदी की जीत ने गठबंधन और क्षेत्रीय दलों की राजनीति के युग का अंत कर दिया पर गैर-हिंदी क्षेत्रों की क्षेत्रीय पार्टियां मैदान में जमी हैं और उन्होंने अपने यहां भाजपा की जड़ें नहीं जमने दी हैं। मोदी ने राजनीति में अपराध और पैसे की जगह भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और महंगाई को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाने में सफलता पाई। गुजरात मॉडल के विकास के नाम पर सकारात्मक वोट कराया, लेकिन इस बार जितना खर्चीला चुनाव कभी नहीं हुआ और इस बार जितना कॉर्पोरेट समर्थन भी कभी किसी दल को नहीं मिला। हालांकि, मोदी ने सरकार से कॉर्पोरेट लॉबीइस्टों, भाई-भतीजों और थके-पिटे नेताओं को किनारे करने का साहस भी दिखाया। मोदी ने पार्टी और सरकार पर पूरा नियंत्रण रखने का सफल उद्यम भी किया। उन्होंने खाएंगे और खाने देंगे की खुली घोषणा भी की। अमित शाह को पार्टी की कमान देकर उन्होंने भाजपा को चुनाव जीतने की मशीन बनाने की तरफ मोड़ा। मोदी को सम्भवत: उनकी उम्मीद से ज्यादा स्पष्ट जनादेश हासिल है, इसलिए वे जो कुछ भी कर रहे हैं उस पर पार्टी, मीडिया और सरकार में बैठे