थोक धर्म परिवर्तन पर रोक लगे
नरेंद्र मोदी सरकार की मुसीबतें बढ़ती ही जा रही हैं। संसद का यह सत्र भी फिजूल की बहसों पर बलि चढ़ रहा है। पहले रामजादा और इस शब्द में ‘ह’ उपसर्ग जोड़कर बने शब्द की बहस चली, फिर ‘घर वापसी’ का तूफान उठा और फिर नाथूराम गोडसे गूंजने लगा। संसद का काम क्या इन्हीं मुद्दों पर मुठभेड़ करते रहना है? या फिर देश के महत्वपूर्ण आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर नीति निर्धारण करना कानून बनाना है?
जाहिर है कि ये मुद्दे मोदी की सरकार ने नहीं उठाए और ही उसने इनका समर्थन किया है, लेकिन क्योंकि ये मुद्दे भाजपा के सांसदों पार्टी से जुड़े संगठनों ने उठाए हैं, इसीलिए विपक्ष सरकार पर प्रहार कर रहा है। उसका काम ही प्रहार करना है, इसलिए विपक्ष को दोष क्यों दिया जाए? यह कहने का कोई अर्थ नहीं कि विपक्ष के पास तो कोई दमदार नेता हैं और ही जानदार मुद्दे! इसीलिए वह सरकार की टांग-खिचाई करता रहता है।
जिन मुद्दों पर आजकल हंगामा मचा हुआ है, उन पर सरकार के पास कहने के लिए कुछ नहीं है। वह कहना चाहे तो भी क्या कह सकती है? यदि सरकार साध्वी को बर्खास्त कर देती, आगरा के धर्म-परिवर्तन को अनैतिक बता देती और गोडसे के प्रशंसक सांसद की स्पष्ट भर्त्सना कर देती तो उसे डर लगा रहता कि उसके कट्टर समर्थक नाराज हो जाएंगे, इसीलिए प्रधानमंत्री हों या मंत्री हों, वे अपना बचाव करते समय तुतलाते हुए दिखाई पड़ते हैं। 56 इंच के सीने वाली सरकार का आए दिन यह तुतलाते रहना उसकी छवि को फीका कर रहा है। पिछले छह माह में उसने जो कई रचनात्मक और साहसिक पहल की हैं, वे सब हाशिये में खिसकती जा रही हैं।
हमारे टीवी चैनल और अखबार दर्शक और पाठक संख्या बढ़ाने के लिए ऐसी खबरों को जरूरत से ज्यादा उछालते हैं। समाजशास्त्र, इतिहास और राजनीति के गंभीर और जटिल मुद्दों पर भी वे अनपढ़ नेताओं की ऊटपटांग राय को टीवी पर दिनभर फेंटते रहते हैं। परस्पर-विरोधी पार्टियों के प्रवक्ता (भोंपू) एक-दूसरे पर जमकर कीचड़ उछालते हैं। तिल का ताड़ बनाने में वे माहिर हैं। टीवी स्टूडियो आजकल तीतर-बटेर की लड़ाइयों के अखाड़े बन गए हैं। आम आदमी कोे किसी भी समस्या के गंभीर पहलुओं को समझने की सुविधा ही उपलब्ध नहीं हैं। यदि खबरपालिका और विधानपालिका (संसद) चाहे तो इन्हीं सतही मुद्दों में से कुछ बुनियादी और दूरगामी नुक्ते निकालकर ऐसे कानून बनवा सकती हैं, जिनसे हमारा लोकतंत्र पटरी