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महिलाओं पर हमले करने वाले कितने हैं, पुलिस वाले कितने हैं और हम कितने हैं?
कुछ नहीं,एक महिला चीख रही थी।
महिला स्वयं एक चीत्कार बनकर रह जाएगी?
पता नहीं, अरुणा शानबाग की तो चीख भी घुट गई थी।
वो कौन थी? निर्भया?
नहीं। सब भूल चुके हैं। नर्स, जो भयावह शिकार हुई थी। एक वार्ड बॉय सोहनलाल की दरिंदगी का। मुंबई के केइएम अस्पताल में। कुत्ते को बांधने वाली जंजीर से उसने ऐसा जकड़ा अरुणा को कि शरीर ने मरने से ही मना कर दिया। बस, रक्त जकड़ गया। नारी गरिमा पर हमले की सबसे हैवानी घटना थी वह। पिछले दिनों 41 साल पूरे हुए। और 41 सालों से ही ऐसी चीख चिंघाड़ रही है। चीखने वाली आवाज़ हर बार बदल जाती है। इतने समय से वह वार्ड नं. 4 में नर्सों की देखरेख में बिना हिले, बिना डुले हर पल मरती है। तीन साल पहले, उसकी लड़ाई लड़ चुकी पत्रकार पिंकी विरानी ने दया-मृत्यु का मुकदमा सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचाया था। तब मानवीय आधार पर, अस्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सहयोगी नर्सों के योगदान को प्रभावी मानते हुए अरुणा की सेवा जारी रखने की बात कही थी। तब देशभर में सिर्फ सुर्खियों में आई थी।
फिर चीख घुटकर रह गई।
चीखें दम नहीं तोड़तीं।
दबा दी जाती हैं।
तब यदि कानून के रखवालों को कोई झंझोड़कर कहता कि महिलाएं उन्हें देख रही हैं तो कोई तो जिंदा होता। बस में, टैक्सी में, सार्वजनिक स्थलों पर हैवान बन युवतियों को तबाह कर रहे हैं - उनमें अधिकतर पहले भी ऐसा पाप कर चुके थे। पुलिस ने उन्हें ऐसा फिर करने का अवसर दिया।
मुंबई में फोटो जर्नलिस्ट की गरिमा तार-तार करने वालों और उसके कारण बने पुलिस वालों पर ‘असंभव के विरुद्ध’ में आक्रामक प्रहार किया जा चुका है। सारे हमलावर कितने उन्मुक्त थे इतनी बड़ी, इतनी घिनौनी हरकत के बाद। एक दही-हांडी स्पर्धा में भाग लेने चला गया। एक चाय पीता रहा। पुलिस स्टेशन के पास। दो फिल्म देखने गए। इंटरवल में फोन पर पता चला कि साथियों को पुलिस पकड़कर ले गई। तो जांच में कबूला कि उसे आश्चर्य हुआ था कि ‘पुलिस क्यों ले गई’।
महिलाओं पर हमले करने वाले सारे अपराधी ऐसे ही पूछते हैं। वे मान ही नहीं पाते कि कभी पुलिस उनका कुछ कर भी सकती है।
सारे पुलिस वाले ऐसे तो नहीं हैं।
ऐसे निकृष्ट हो ही नहीं सकते।
इतने कायर क्योंकर होंगे?
कुछ, मुठ्ठीभर, साहसी भी होंगे।
कुछ अच्छे भी होंगे।
चुनिंदा अपराध और अपराधियों को तबाह करने का सपना और संकल्प लिए भी पुलि