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पेस बढ़ा सकते थे टीम इंडिया का हौसला, पर बोर्ड ने मौका गंवाया

6 वर्ष पहले
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रतीय टीम प्रबंधन के पास वर्ल्ड कप से पहले मौका था कि वह धोनी से मिलने के लिए लिएंडर पेस को बुलाता, जो विश्व कप की तैयारियों के लिहाज से महत्वपूर्ण साबित होता लेकिन उसने यह मौका गंवा दिया। 41 साल के पेस पिछले दिनों ऑस्ट्रेलिया में ही थे। मार्टिना हिंगिस के साथ मिलकर 15वां ग्रैंडस्लैम जीता था। इस उम्र में ग्रैंडस्लैम जीतना किसी के लिए भी प्रेरणास्पद हो सकता है। लंबी सीरीज के बाद आराम और आत्मावलोकन के बाद धोनी ने कहा कि वे मानते हैं कि यह वक्त विश्व कप के लिए लय हासिल करने का है। गेंदबाजों में ताजगी और आत्मविश्वास वापस पाने के लिए बूट कैंप का सहारा लिया गया। ऐसे में पेस भी अहम साबित हो सकते थे।

बीसीसीआई भारतीय टीम की मदद के लिए समय-समय पर पूर्व क्रिकेटर, मनोवैज्ञानिकों का सहारा लेता रहा है। ऐसे वक्त में जब टीम विश्व कप की तैयारियों में जुटी है और पेस उसके लिए सहज उपलब्ध हो सकते थे तो उनकी मदद ली जानी चाहिए थी। इस पर बहस हो सकती है कि पेस का शुरुआती वक्तव्य तो टेनिस से जुड़ा होता और वे इस खेल के लिए पूरी तरह फिट नहीं हो पाते। लेकिन जो पेस को जानते हैं वे यह भी जानते हैं कि वे क्रिकेट के बड़े प्रशंसक रहे हैं। उनके क्रिकेट ज्ञान को लेकर संशय नहीं किया जा सकता है। लेकिन क्रिकेट की जानकारी बड़ा मसला नहीं है। पेस खुद सोचते कि उन लोगों से क्रिकेट की तकनीक और रणनीति पर चर्चा करना न्यायसंगत नहीं होगा, जो इसे रोज खेलते हैं। पेस इसकी बजाय दूसरे मुद्दों पर उपयोगी साबित होते जैसे कि वे टीम का मनोबल और हौसला बढ़ा सकते थे। वे बता सकते थे कि उन्हें अपने सुनहरे कॅरिअर के दौरान किन मुश्किलों का सामना करना पड़ा या वे कैसे किसी संकट से उबरकर पूरे विश्वास से कोर्ट पर लौटे।

आखिर पेस की जिंदगी और खेल की वे कौन सी उपलब्धियां हैं जो उन्हें टेनिस लीजेंड बनाती हैं। क्यों साथी खिलाड़ी उन्हें सबसे बेहतरीन खिलाड़ियों में से एक मानते हैं जबकि वे पिछले डेढ़ दशक से सिर्फ डबल्स मैच खेलते हैं। वे सिंगल्स कब का छोड़ चुके हैं तब भी वह क्या चीज है जो उन्हें लगातार खेलते रहने को प्रेरित करती है? मेरे ख्याल से यह सब उनके नैतिक गुणों की देन है: लगातार जुनूनी रहना, गजब का फिटनेस, मानसिक ताकत और अंत तक हार मानने की खूबी। वैसे तो ये सभी गुण परस्पर जुड़े हुए हैं। लेकिन इनमें से अंतिम दो का खेलों की दुनिया में ज्यादा ही महत्व है। मैं यह भी मानता हूं कि पेस के खेल का सिद्धांत या दर्शन उल्टी तरह का है। यकीनन, खेल के लिए सबसे जरूरी यह है कि आप उसे प्यार करें। लेकिन उनकी कामयाबी की मूल वजह यह है कि उन्हें आज भी प्रतिद्वंद्विता उतनी ही पसंद है, जितनी 20 साल पहले थी। वे सिर्फ मजे के लिए नहीं खेलते, वे तो जीतने के लिए खेलते हैं। इसीलिए 41 की उम्र में भी टेनिस कोर्ट में प्रतिस्पर्धी बने हुए हैं। वे जानते हैं कि उन्हें अपनी शारीरिक और मानसिक फिटनेस के लिए और कड़ी मेहनत की जरूरत है। इसलिए अपने हर मुकाबले के लिए पूरा प्लान बनाते हैं, जिसमें प्रतिद्वंद्वी, कोर्ट, खेलने की परिस्थिति का पूरा ध्यान रखा जाता है। भारतीय टीम को विश्व कप के लिए ऐसी ही योजना और उसे क्रियान्वित करने की जरूरत है। समस्या खेलने की शैली या क्षमता की नहीं है, बल्कि लक्ष्य पर फोकस करने और उसके लिए खुद को प्रेरित करने की है। यह सुनने में साधारण लग सकता है। ऑस्ट्रेलिया में टेस्ट और ट्राई सीरीज में हार के बाद भारतीय टीम का आत्मविश्वास कम हुआ है। यकीनन, खेल में अक्सर चीजें बड़ी जल्दी बदलती हैं। लेकिन यह धोनी पर निर्भर करेगा कि वे अपने खिलाड़ियों को कैसे प्रेरित करते हैं। और मैं यह बड़ी शिद्दत से मानता हूं कि लिएंडर पेस से अगर संपर्क किया गया होता वे इस स्थिति में बड़ा बदलाव ला सकते थे।