पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें
  • Hindi News
  • निर्धनों के मसीहा थे अल्बर्ट श्वाइत्जर

निर्धनों के मसीहा थे अल्बर्ट श्वाइत्जर

7 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
दो छोटेबालक परस्पर मित्र थे। वे प्रतििदन साथ-साथ विद्यालय जाते थे। उनका अध्ययन, खेलकूद, खाना लगभग साथ-साथ ही होता था। विद्यालय जाते वक्त दोनों खूब सारी बातें करते और कभी-कभी किसी बात पर लड़ भी पड़ते। बच्चे ही ठहरे, सो लड़ाई भी अधिक देर तक नहीं चलती और पुन: मित्रता हो जाती। उनमें से एक बच्चा संपन्न परिवार का था और दूसरा निर्धन था। हालांकि मित्रता इससे अप्रभािवत थी। परस्पर पर्याप्त स्नेह सौहार्द था। एक दिन दोनों बच्चे घर से विद्यालय जाने के लिए निकले, तो रास्ते में परस्पर बातचीत की धारा-कुश्ती की ओर मुड़ गई। कुछ ही देर में इस विषय पर बात करते-करते दोनों कुश्ती लड़ने लगे। दोनों में से जिसका शरीर बलवान था, वह जीत गया और स्वाभाविक रूप से बलवान बच्चा संपन्न परिवार का था। तब हारने वाले बच्चे ने कहा, ‘तुझे जिस प्रकार का अच्छा भोजन मिलता है, वैसा ही भोजन यदि मुझे मिले तो मैं भी जीत जाऊं।’ अपने साथी की पराजय का कारण उसकी शारीिरक दुर्बलता और उपयुक्त आहार की कमी के विषय में जानकर संपन्न बच्चे को बहुत पीड़ा हुई और उसने तभी से अपना जीवन लक्ष्य तय कर लिया। वह बड़ा होकर चििकत्सक बना और अपनी जन्मभूमि छोड़कर सुदूर अफ्रीका के जंगलों में चला गया। वहां एक सेवाग्राम बनाकर वह आजीवन अफ्रीका के दलित और पीड़ित लोगों की सेवा करता रहा। निर्धनों असहायों का यह सेवक था- अल्बर्ट श्वाइत्जर, जिन्हें उनकी अमूल्य सेवाओं के लिए शांति का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। पीड़ित मानवता की सेवा को जीवन लक्ष्य बनाने वाले सच में महान होते हैं। स्वयं से जुड़े समस्त हितों का त्याग कर दूसरों के कल्याण हेतु कर्मरत रहना मानवता की चरमकोटि है।

जीवन दर्शन