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छोटी बातों में छिपा लंबे जीवन का राज

5 वर्ष पहले
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अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घायु के लिए आपको शाकाहारी होने, कड़ी एक्सरसाइज करने या ध्यान में डूबने की जरूरत नहीं है। साइंस की नई खोज बता रही है, जीवनशैली में मामूली परिवर्तन के माध्यम से लंबा स्वस्थ जीवन बिताना संभव है। शोधकर्ताओं ने पाया है, जिम में घंटों बिताने के बावजूद लंबे समय तक बैठने के दुष्प्रभावों से बचा नहीं जा सकता है लेकिन सक्रियता और चंचलता से अच्छे परिणाम मिलते हैं। यह भी पाया गया है, खानपान में कटौती से आयु बढ़ती है। वैज्ञानिकों को विश्वास है,आपकी मन स्थिति की स्वस्थ शरीर में महत्वपूर्ण भूमिका है। लंबी आयु के संबंध में साइंस की नई रिसर्च कई महत्वपूर्ण तथ्य पेश करती हैं।

क्या हैं, कैलोरी के मायने?

जुलाई, 2015 में जेरोनटोलॉजी जर्नल में कुछ लोगों को कम कैलोरी के आहार पर दो वर्ष तक रखने के ट्रायल के परिणाम प्रकाशित हुए थे। कैलेरी नामक ट्रायल में सामान्य वजन या मामूली अधिक वजन वाले 21 से 50 वर्ष की आयु के 218 लोगों को तय डाइट पर रखा गया। इनमें से आधे लोगों ने अपनी पसंद का खाना खाया। आधे लोगों की कैलोरी में 25 प्रतिशत कटौती की गई। ट्रायल के अंत में पाया गया, कम कैलोरी वाले समूह का वजन दस प्रतिशत घट गया। महत्वपूर्ण बात है कि कैलोरी में कमी से लोगों की हालत दयनीय नहींं हुई। स्टडी में हिस्सा लेने वाले लोगों को थकान या चिड़चिड़ेपन का अनुभव नहीं हुआ। शोधार्थियों ने पाया, कम कैलोरी वाले ग्रुप का ब्लड प्रेशर 4 प्रतिशत, कोलेस्ट्राल 6 प्रतिशत गिर गया। हृदय रोग से संबंधित सी-रिएक्टिव प्रोटीन का स्तर 47 प्रतिशत कम हो गया। लंबी आयु के लिए थोड़ा कम खाना प्रभावकारी है।

दक्षिण कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में दीर्घायु संस्थान के डायरेक्टर वाल्टर लोंगो की रिसर्च से पता लगा है, कभी-कभार उपवास करने वाले लोगों में बुढ़ापे से संबंधित बीमारियों का खतरा घट जाता है। लोंगो ने चूहों और मानवों पर प्रयोग किए। कम कैलोरी, कम प्रोटीन वाले आहार से चूहों की हडि्डयों को कम क्षति पहुंची। कैंसर की दर कम रही। उनकी आयु बढ़ गई। लोंगो ने 19 व्यक्तियों को सप्ताह में पांच दिन ऐसा ही डाइट दिया। मैनू में अच्छा आहार भरपूर था लेकिन कैलोरी 34 से 54 प्रतिशत कम थी। तीन माह बाद स्टडी में शामिल लोगों में बुढ़ापे, डायबिटीज, दिल की बीमारी, कैंसर से संबंधित खतरे वाले कारणों में गिरावट पाई गई। ब्लड शुगर और बुढ़ापे को तेज करने वाले आईजीएफ-1 हार्मोन के स्तर में कमी आई। कुछ विशेषज्ञों का कहना है, उपवास से तनाव कम होता है। इसका शरीर की कोशिकाओं पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। लोंगो कहते हैं, बुढ़ापे और उससे संंबंधित बीमारियों को रोकने में डाइट सबसे अधिक शक्तिशाली औजार है।

थोड़ा चलना-फिरना बेहतर

ताजा रिसर्च से ज्ञात हुआ है, स्वस्थ शरीर के लिए जिम जाना जरूरी नहीं है। सक्रियता अधिक महत्वपूर्ण है। पिछले दो वर्षों में वैज्ञानिकों ने पाया है, दिन भर बैठे रहने से जल्द मौत का खतरा बढ़ता है। 2015 में कई अध्ययनों से पता लगा है, अगर लोग नियमित रूप से एक्सरसाइज करते हैं लेकिन घंटों बैठे रहते हैं तो भी टाइप-2 डायबिटीज और लिवर की बीमारी का खतरा अधिक हो जाता है। अच्छी खबर है कि बैठे-बैठे भी हलचल करना फायदेमंद है।

2015 में अमेरिकन हार्ट जर्नल में प्रकाशित स्टडी में बताया गया कि 70 से 80 वर्ष की आयु के 1000 वयस्कों को फिटनेस ट्रेकर लगाए गए। जिन लोगों की शारीरिक गतिविधि कम दर्ज की गई, उनमेें दिल की बीमारी का जोखिम अधिक था। लेकिन, शोधकर्ताओं को आश्चर्य हुआ कि जो लोग दिन में थोड़ा बहुत भी चलते-फिरते थे, उनमें दिल की बीमारी का खतरा कम पाया गया। 2014 में अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन के जर्नल में बुजुर्गों की जीवनशैली पर प्रकाशित स्टडी में सक्रियता के फायदे बताए गए हैं। स्टडी में 70 से 89 वर्ष की आयु के बीच 1600 निष्क्रिय लोगों को शामिल किया गया था। लगभग तीन वर्ष तक एक समूह ने पैदल चलने जैसी हल्की एक्सरसाइज की। दूसरे ग्रुप ने स्वास्थ्य शिक्षा से संबंधित क्लास में हिस्सा लिया। शारीरिक गतिविधि में हिस्सा लेने वाला ग्रुप दूसरे ग्रुप की तुलना में प्रति सप्ताह 104 घंटा अधिक पैदल चला। उसमें निष्क्रियता के कारण होने वाली शारीरिक समस्याएं कम पाई गईं। कुछ लोगों ने तनाव कम महसूस किया।

मानसिकता का आयु पर प्रभाव

अब स्पष्ट हो चुका है, हमारी भावनाएं शारीरिक स्थिति पर प्रभाव डालती हैं। नई रिसर्च बताती है,तनाव के कारण बुढ़ापे की बीमारी अल्जाइमर से लड़ने में दिमाग की क्षमता कमजोर पड़ती है। पिछले वर्ष प्रकाशित दो अध्ययनों से बुढ़ापे के संबंध में व्यक्ति की नकारात्मक सोच के कारण दिमाग में होने वाले परिवर्तनों पर रोशनी पड़ी है। पहली स्टडी में शोधकर्ताओं ने 40 वर्ष की आयु के पुरुषों और महिलाओं से वृद्धावस्था के संबंध में प्रचलित कुछ धारणाओं- जैसे कि बूढ़ों को नई बातें सीखने में कठिनाई होती है,बूढ़े लोग सिरफिरे होते हैं- पर राय जताने के लिए कहा गया था।

25 वर्ष बाद शोधकर्ताओं ने इनमें से कुछ लोगों के दिमाग की स्कैनिंग की। पाया गया कि जिन लोगों ने कम आयु में बुढ़ापे के संबंध में नकारात्मक विचार रखे थे। उनके मस्तिष्क में हिप्पोकेंपस की मात्रा काफी कम हो गई थी । हिप्पोकेंपस का संबंध अल्जाइमर बीमारी से है। कुछ मृतकों के दिमाग का पोस्टमार्टम करने पर पाया गया कि बुढ़ापे पर नकारात्मक विचार रखने वाले लोगों के दिमाग में एमीलॉयड की परत अधिक पाई गई। प्रोटीन की परत बढ़ने से अल्जाइमर होता है। एक अन्य रिसर्च ने बताया है, बुढ़ापे पर नकारात्मक धारणा रखने वाले लोगों को दिल की बीमारी का खतरा भी रहता है।

2015 में ब्राउन यूनिवर्सिटी की एक स्टडी से पता लगा कि ध्यान या एकाग्रता के साथ चिंतन करने वाले लोगों के शरीर में फैट कम रहा। उनका दिल भी दूसरे लोगों की तुलना में स्वस्थ पाया गया। कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर एलिसा एपेल की स्टडी बताती है, ध्यान के कुछ तरीके बुढ़ापे के शारीरिक परिवर्तर्नों की गति धीमी करते हैं। अगर आप घंटों ध्यान नहीं कर सकते हैं तो रोजमर्रा की जिंदगी में वर्तमान क्षण पर फोकस करें। सामजिक संबंध सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं।

वैज्ञानिकों ने पाया कि दिन भर बैठने से जल्द मौत का खतरा बढ़ता है।

ध्यान और एकाग्रता से तनाव घटता है। शरीर के बूढ़े होने की प्रक्रिया धीमी पड़ती है।

बुढ़ापे और उससे संबंधित बीमारियों को रोकने का सबसे शक्तिशाली साधन आहार है।

दीर्घजीवन के कुछ टिप्स
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