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वाटर प्यूरीफायर के बाद हवा में छिपा हो सकता है अगला बिजनेस
इलेक्ट्रॉनिक्स बनानेवाली कंपनी फिलिप्स ने पिछले साल एयर प्यूरीफायर लॉन्च किया था। इसकी कीमत है 15,000 से 49,000 रुपए। अभी इसके आधे ग्राहक विदेशी हैं। इस साल भारतीयों ने भी इसे खरीदना शुरू किया है। कंपनी की बिक्री पिछले साल के मुकाबले 20 फीसदी बढ़ी है।
एक और कंपनी है यूरेका फोर्ब्स। उसका दावा है कि पिछले दो-तीन साल से उसके एयर प्यूरीफायर की बिक्री 60 से 70 फीसदी बढ़ रही है। शार्प के प्यूरीफायर 15,000 से 30,000 रुपए के बीच मिलते हैं। कंपनी हर महीने 1100-1200 प्यूरीफायर बेचती है। भविष्य का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि दिल्ली के आईटीसी मौर्य होटल ने 2013 में 80 कमरों को एयर प्यूरीफायर से ही ‘एलर्जी-फ्री’ किया था। कुछ एयर प्यूरीफायर एक लाख रुपए तक के होते हैं। ये बैक्टीरिया, वायरस और पार्टिकुलेट मैटर को हटाते हैं, जो सांसों के साथ हमारे शरीर में जा सकते हैं। बिजली भी एक पंखे जितनी ही लेते हैं। इनकी फिल्टरेशन टेक्नीक हवा से धूल-कण, फफूंद, रूसी और तंबाकू की धुआं हटाती है। हवा में मौजूद धूल और अल्ट्राफाइन पार्टिकल पार्टिकुलेट मैटर होते हैं।
बढ़ता वायु प्रदूषण लगातार चिंता का विषय बनता जा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत आए थे तो दूषित हवा मुद्दा बन गई थी। यूनाइटेड नेशंस एन्वायर्नमेंट प्रोग्राम (यूएनईपी) के मुताबिक दिल्ली की हवा वैसी ही है, जैसी एक दिन में 20 सिगरेटों के कश से निकलने वाला धुआं। दुनिया में रहने लायक सबसे अच्छी जगहों की इस रिपोर्ट में बंगलुरू को 139वें स्थान पर रखा गया है। इसी प्रदूषित हवा के रूप में बंगलुरू में रहने वाला हर शख्स एक दिन में कम से कम छह सिगरेट पी लेता है।
आंकड़े खुद बताते हैं कि यह हवा कितनी जानलेवा है। यूएनईपी रिपोर्ट के मुताबिक 2005 से 2010 के बीच दुनियाभर में प्रदूषित हवाओं के कारण 4 फीसदी मौतें हुईं। वहीं चीन में यह आंकड़ा 5 प्रतिशत और भारत में 12 फीसदी है। दुनियाभर में प्रदूषण से हर साल 35 लाख लोगों की मौत हो जाती है। घर के भीतर की प्रदूषित हवा 13 लाख भारतीयों की मौत का कारण बनती है। यह आंकड़ा हाई ब्लड प्रेशर से होने वाली मौतों के बाद सबसे ज्यादा है।
हालांकि इसका कोई वैज्ञानिक अध्ययन नहीं है कि एयर प्यूरीफायर सांस लेने में होने वाली दिक्कत से भी निजात दिला सकते हैं। लेकिन इससे इनके बिक्री पर कोई फर्क नहीं पड़ता। लोगों को बस साफ हवा चाहिए।
जब स्वच्छ हवा की बात आती है तो इसके विकल्प बेहद कम हो जाते हैं। 1990 के दशक में शहरी इलाकों में रहने वाले भारतीयों ने नल के पानी के बजाय फिल्टर्ड पानी पीना शुरू किया था। आज देश में वायर प्यूरीफायर का बाजार 3500 करोड़ रुपए का है। क्या एयर प्यूरीफायर अगला आरओ हो सकता है? यह इस पर निर्भर करता है कि ये गैजेट कितने प्रभावी होते हैं और हम अपने पर्यावरण को कितनी तेजी से प्रदूषित होने देते हैं।
विशेषज्ञों ने अब तक जो उपाय सुझाए हैं, उनमें निकट भविष्य में घरों के आसपास पेड़ों की कम से कम 2-3 परतें होनी जरूरी हैं। ताकि घरों के आसपास की आबोहवा में पार्टिकुलेट लेवल कुछ कम हो सके। सही अनुपात में पौधारोपण ही पर्यावरण में कार्बन डाई ऑक्साइड का स्तर कम कर सकता है।
raghu@dainikbhaskargroup.com
फंडा यह है कि
साफहवा का कारोबार अगला बिजनेस मॉडल हो सकता है। अब यह खरीदने वाले पर निर्भर करता है कि वह मशीनों से साफ हवा चाहता है या हरित क्रांति से।