इसलिए ओबामा हमें आगाह कर गए
भाजपा ने लोकसभा का चुनाव चाहे विकास के मुद्दे पर लड़ा हो, लेकिन उसने हिंदुत्व का मुद्दा छोड़ा नहीं। यही वजह है कि बराक ओबामा को कहना पड़ा कि धार्मिक विभाजन हो तो भारत विकास करता रहेगा।
पिछलेकुछ समय से भारतीय जनता पार्टी और संघ परिवार के कई नेताओं के बयानों ने माहौल गर्म कर रखा है। लव जेहाद, भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने,घर वापसी, हिंदू परिवारों से चार से अधिक बच्चे पैदा करने और संविधान से समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष शब्द हटाने जैसे कथनों ने कई हलकों में बेचैनी पैदा की है। विकास और सुशासन का नारा देकर सत्ता में आई भाजपा सरकार को भी एेसे उत्तेजक बयानों से परेशानी हो रही होगी। यहां सवाल उठता है, क्या वास्तव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने सहयोगियों की बयानबाजी से असहज महसूस कर रहे हैं? वैसे, उन्होंने अब तक सार्वजनिक रूप से कोई प्रतिक्रिया नहीं जताई है। गृहमंत्री राजनाथसिंह और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह जरूर इनमें से कुछ बातों पर असहमति व्यक्त कर चुके हैं।
भाजपा के एजेंडा और कार्यक्रमों पर नजर डालें तो साफ है कि हिंदुत्व उसका मुख्य आधार है। 1984 में लोकसभा की दो सीटों पर सिमटने के बाद पार्टी ने खुलेआम धार्मिक भावनाओं को भड़काने का सहारा लिया था। अयोध्या आंदोलन को सांस्कृतिक पुनर्जागरण की संज्ञा दी गई। लेकिन, उसका भारत की सहिष्णु और उदार सामाजिक, सांस्कृतिक परंपरा से कोई संबंध नहीं था। उसका लक्ष्य वोट बैंक था। वह विश्वनाथ प्रताप सिंह की मंडल राजनीति और कांग्रेस के अल्पसंख्यक तुष्टिकरण का जवाब था।
1998 से 2004तक एनडीए शासनकाल के दौरान भाजपा ने उग्र हिंदुत्व को लगभग हाशिये पर रख छोड़ा था। अटलबिहारी वाजपेयी पार्टी का नरम और उदार चेहरा थे। संघ परिवार उनसे नाराज रहता था। इस बीच गुजरात में मोदी क्षितिज पर चुके थे। 2002 के दंगों में गुजरात सरकार की विवादास्पद भूमिका से प्रभावित मोदी को हिंदू हृदय सम्राट की उपाधि से विभूषित किया। इसके बाद हुए चुनावों में मोदी ने सांप्रदायिक भावनाओं को रेखांकित करने का कोई अवसर नहीं खोया। वे जनसभाओं में अल्पसंख्यकों पर अप्रत्यक्ष रूप से प्रहार करते थे।
2014 का लोकसभा चुनाव आते-आते मोदी विकास की राजनीति का प्रतीक बन चुके थे। वे और उनके रणनीतिकार समझ चुके थे कि उग्र हिंदुत्व के सहारे चुनावी महाभारत में निर्णायक विजय नहीं हासिल की जा सकती है। वैसे, उन्होंने हिंदुत्व से एकदम किनारा भी नहीं किया। उनका हिंदुओं के सबसे बड़े तीर्थ स्थल बनारस से भी लोकसभा चुनाव लड़ने का फैसला जनता की धार्मिक नब्ज पर हाथ रखने से प्रेरित था।
मतलब यह कि भाजपा उग्र हिंदुत्व के अघोषित एजेंडा पर चलती रहेगी। घर वापसी सहित अन्य मसलों पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की खामोशी उनकी मौन स्वीकृति की ओर इशारा करती है। शायद, इसलिए अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा को कहना पड़ा है कि भारत अगर धर्म के आधार पर नहीं बंटेगा तो आर्थिक विकास करता रहेगा। लेखकदैनिक भास्कर के वरिष्ठ पत्रकार हैं। rajesh.pandey@dbcorp.in