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अमित शाह : पार्टी में शक्ति केंद्र का उदय

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के आवास पर पुरानी पीढ़ी के नेताओं के घरों की तरह बहुत ही कम फर्नीशिंग है। मिलने आने वालों से...

Dainik Bhaskar

Sep 06, 2017, 03:10 AM IST
अमित शाह : पार्टी में शक्ति केंद्र का उदय
भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के आवास पर पुरानी पीढ़ी के नेताओं के घरों की तरह बहुत ही कम फर्नीशिंग है। मिलने आने वालों से वे बीच में रखे सोफे की प्रिय जगह से बातें करना पसंद करते हैं, पीठ दीवार की तरफ होती है। उनसे मिल रहे व्यक्ति को दीवार पर दो तस्वीरें दिखती हैं। आंखों की बाईं ओर चाणक्य अथवा कौटिल्य और दायीं तरफ सावरकर। ये दो देवता ही उनकी राजनीति तय करते हैं- राजनीतिक चातुर्य के लिए कौटिल्य और सावरकर हिंदुत्व व राष्ट्रवाद की विचारधारा के लिए।

हालांकि, शाह दीवार पर एक तीसरा पोर्ट्रेट भी लगा सकते हैं, आदर्शरूप में तो कौटिल्य और सावरकर के बीच। इसके लिए पक्का कांग्रेसी होना जरूरी है। क्योंकि जहां उनकी राजनीतिक व राज्य-शक्ति और दार्शनिक प्रेरणा पहले से वहां मौजूद दो व्यक्तित्वों से आती है, उनकी राजनीतिक शैली और अपनी पार्टी पर उनका प्रभुत्व दिवंगत कांग्रेस अध्यक्ष (1963-67) के. कामराज के सर्वोत्तम दिनों की याद दिलाती हैं। कामराज के बाद से कैबिनेट मंत्रियों को सत्तारूढ़ दल के अध्यक्ष के दफ्तर में अपनी रिपोर्ट कार्ड पढ़ने अथवा पार्टी के काम को समय देने के उद्‌देश्य से इस्तीफे की पेश करते नहीं देखा गया था। यह ड्रामा अभी मंत्रिमंडल में फेरबदल के पहले खेला गया। कामराज के 1963-67 के पहले दौर के बाद किसी पूर्णकालिक सत्तारूढ़ पार्टी अध्यक्ष ने शक्ति का ऐसा प्रदर्शन नहीं किया। स्पष्ट कर दें कि हम यहां केवल पूर्णकालिक पार्टी अध्यक्षों की बात कर रहे हैं, जो कांग्रेस के उन प्रधानमंत्रियों से अलग हैं, जो पार्टी अध्यक्ष भी थे या ऐसे पार्टी अध्यक्ष, जिन्होंने सीमित शक्तियों के साथ प्रधानमंत्री को ‘नियुक्त’ किया हो। देवकांत बरूआ, चंद्रशेखर (जनता) और वे जो वाजपेयी के कार्यकाल में इसी पद पर थे उनके पास सीमित अधिकार थे। वे इसलिए इस श्रेणी में नहीं आते।

शाह की ताकत अनोखी है, क्योंकि उनके उत्थान में नरेंद्र मोदी का कोई हाथ नहीं है। बात उलटी है। 2014 के चुनाव के पहले पार्टी अध्यक्ष के रूप में शाह मोदी की व्यक्तिगत पसंद थे। आप किसी मेडिकल पेथोलॉजिस्ट की अत्यधिक संदेहवाली दृष्टि से कितना ही तलाश करें लेकिन, आपको कोई ऐसा मुद्‌दा नहीं मिलेगा, जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री के विपरीत कोई काम किया हो। न इस बात के कोई सबूत है कि उन्होंने कोई बात नहीं मानी हो या फैसला थोपा हो। जब भाजपा ने उन्हें उत्तर प्रदेश चुनाव अभियान का प्रभारी बनाया तो मैंने अपने लेख (13 जुलाई 2013) में पूछा था, ‘वे क्या खा, पी, सोच रहे थे जब उन्होंने ऐसा किया?’ मैं गलत साबित हुआ, क्योंकि उन्होंने 80 में 73 सीटें (सहयोगियों की दो सीटों सहित) दीं। अब लगता है कि मैंने यह गलत धारणा बना ली थी कि भाजपा अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल जैसी एनडीए सरकार बनाना चाहती है। सर्वसमावेशी, मध्यमार्गी, नरम हिंदुत्व। यदि यह धारणा सही होती तो उत्तर प्रदेश में शाह के चयन गलत होने का निष्कर्ष भी सही होता। बाद में जो राजनीति सामने आई उसने यह धारणा कितनी गलत थी इसे और भी रेखांकित किया। वाजपेयी के दिनों जैसी सरकार तो छोड़ों मोदी-शाह तो कोई पछतावा न रखने वाली ‘विशुद्ध’ भाजपा-आरएसएस की सरकार बनाने जा रहे थे। वहां यह भी समझ थी कि वाजपेयी सरकार तो मुश्किल से भाजपा की थी, क्योंकि बहुत सारे प्रमुख मंत्री तो आरएसएस के बाहर के थे। यह जॉर्ज फर्नांडीस जैसे सहयोगी दल के नेता को दिए रक्षा मंत्रालय पर लागू नहीं होता था बल्कि जसवंत सिंह, यशवंत सिन्हा, रंगराजन कुमारमंगलम, अरुण शौरी और अन्य पर भी लागू होता है, जो वैचारिक रूप से आरएसएस और भाजपा के नहीं थे।

अब सरकार न तो विचारधारा और न पार्टी के प्रति सच्ची दिखाई देती है। मौजूदा तंत्र दूसरे छोर पर दिखता है। जहां किसी वैचारिक शुद्धता वाले काम के लिए पार्टी में प्रतिभा न हो तो अब बाहर तलाश करने में इसकी रुचि नहीं है। पार्टी केवल एकदम शुद्ध को ही शक्ति सौंपेगी या उन्हें जिन्होंने दशकों तक काम करके अपना दायित्व पूरा किया है। शाह इसे ही कड़ाई से लागू कर रहे हैं। इस तरह का बहुमत मिलने के बाद लालकृष्ण आडवाणी या भाजपा का कोई अन्य पुराना नेता सरकार बनाता तो वह इस तरह अविचलित वैचारिक प्रतिबद्धता नहीं दिखाता। मोदी ने हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र में आरएसएस प्रचारक और युवा वफादारों को मुख्यमंत्री चुनकर इसे रेखांकित किया है। फिर शाह ने भी गुजरात में विजय रूपाणी, उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ और राष्ट्रपति पद के लिए रामनाथ कोविंद को चुनकर यही किया। यह प्रधानमंत्री का उल्लंघन करके नहीं हुआ बस यही था कि शाह द्वारा किया शुरुआती चयन पार्टी से गुप्त रखा गया।

1963 की गांधी जयंती को कामराज ने पार्टी के कामकाज को समर्पित होने के लिए तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देकर राजनीतिक उथल-पुथल मचा दी थी। उसके बाद छह कैबिनेट मंत्रियों और पांच अन्य मुख्यमंत्रियों ने भी इस्तीफे दे दिए। मोरारजी देसाई और जगजीवन राम जैसे नेता भी शिकार हो गए। यह आंतरिक सफाई का उनका निष्ठुर कदम था, जिसे ‘कामराज योजना’ कहा गया, जबकि तब वे पार्टी अध्यक्ष भी नहीं थे। रूसी तानाशाह स्टालिन जैसी लेकिन रक्तहीन व ‘स्वैच्छिक’ आयामों वाली यह घटना लंबे समय चर्चा में रही और राजनीतिक कार्टूनिस्ट व व्यंग्यकार काफी वक्त तक इस पर अपना हुनर दिखाते रहे। तब पतनशील नेहरू इतने प्रभावित (और संभव है असुरक्षित) हुए कि उन्होंने कहा कि कामराज को पार्टी अध्यक्ष बना दिया जाए। नेहरू के जाने के बाद वे रंग में आए और पहले लाल बहादुर शास्त्री व बाद में इंदिरा गांधी को शपथ दिलाकर मोरारजी देसाई जैसे घुटे हुए नेता की महत्वाकांक्षा कुचल दी। तब ताकतवर कांग्रेस नेता भी उनके पीछे दौैड़ते दिखते थे और वे तमिल में कहते ‘पारकलम’ (देखते हैं)। पता नहीं शाह का कोई ऐसा जुुुमला है या नहीं पर कामराज की बाकी बातें वहां हैं। अब भाजपा संसदीय बोर्ड की बैठक पार्टी दफ्तर में होती है और प्रधानमंत्री वहां आते हैं। पहले उनकी सहूलियत के लिए बैठक प्रधानमंत्री आवास पर होती थी। अब सारे नेता जानते हैं कि प्रधानमंत्री आवास के बाद शक्ति केंद्र कौन-सा है। वे उसके हिसाब से एडजस्ट हो रहे हैं। हाल में हुआ मंत्रिमंडल फेरबदल यही दर्शाता है। (ये लेखक के अपने विचार हैं।)



शेखर गुप्ता

एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’

Twitter@ShekharGupta

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