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उत्तर प्रदेश विधानसभा से उठे सुरक्षा संबंधी सवाल

4 वर्ष पहले
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उत्तर प्रदेश विधानसभा में नेता विपक्ष की सीट के नीचे 150 ग्राम पीईटीएन(पेंटाएरिथ्रीटॉल टेट्रानाइट्रेट) नामक विस्फोटक मिलने से सुरक्षा व्यवस्था में गंभीर चूक उजागर हुई है और परिणामस्वरूप कड़ी चौकसी की आवश्यकता महसूस की गई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सुरक्षा के बारे में जो ग्यारह सूत्र बताए हैं उसे तत्काल प्रभाव से लागू करके देश के सबसे बड़े राज्य के सबसे पुराने विधानमंडल को महफूज किया जाना चाहिए। इस विस्फोटक का प्रयोग आतंकी संगठन करते हैं और अगर इसकी मात्रा पांच सौ ग्राम तक होती तो यह सदन को ध्वस्त करने के लिए काफी होता। इसलिए अगर इसकी जांच एनआईए करे तो इसका आशय और साजिश करने वालों के बारे में जानकारी मिल सकती है। लेकिन रिपोर्ट आने से पहले उसे राजनीतिक कोण देने से उन्हीं का मकसद पूरा होगा जो उत्तर प्रदेश को अस्थिर बनाना चाहते हैं। सुरक्षा किसी भी राज्य व्यवस्था का पहला कर्तव्य है और अगर वह कानून बनाने वालों और सरकार चलाने वालों की सुरक्षा नहीं कर पाएगी तो उन नागरिकों की सुरक्षा कैसे करेगी जिन्होंने उन्हें यह काम दिया है। देश के आम नागरिकों की सुरक्षा और विशिष्ट जनों की सुरक्षा में एक स्पष्ट नीति के तहत तर्कसंगत लोकतांत्रिक अनुपात होना चाहिए। ये शिकायतें आम हैं कि सुरक्षा बलों का बड़ा हिस्सा विशिष्ट जनों की सुरक्षा में लगा रहता है और आम नागरिक असुरक्षित रहता है। जाहिर है इसके पीछे सुरक्षा व्यवस्था का विशिष्टीकरण और राजनीतिकरण भी काफी जिम्मेदार है। इसीलिए सुरक्षा व्यवस्था को समर्थ बनाने के लिए पुलिस सुधार का सुझाव अक्सर दिया जाता है। उस बारे में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद विभिन्न राज्य उसे टाल रहे हैं। वजह साफ है कि सुरक्षा व्यवस्था वास्तव में सुरक्षा से ज्यादा राजनीति से जुड़ गई है और जिन बेगुनाह और भले लोगों को जाति, धर्म, लिंग, पंथ और भाषा की परवाह न करते हुए सुरक्षा दी जानी चाहिए वह उन्हें नहीं मिलती। उल्टे सुरक्षा उन्हें मिलती है जो राजनीतिक रूप से रसूखदार हैं। राज्य की किसी भी संस्था की सुरक्षा समाज के भाईचारे व सद्‌भाव से भी जुड़ी हुई है। अगर समाज में कदम-कदम पर नफरत और असुरक्षा होगी तो राज्य की संस्थाओं पर उसका असर भी जाएगा, इसलिए मुख्यमंत्री योगी के अल्पकालिक सुझावों को मानने के साथ दीर्घकालिक उपायों पर भी विचार होना चाहिए।

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