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मालवा के मांडने को पहचान दिलाने में जुटी वंदना
मालवाक्षेत्र की लोक कला मांडना को लोग भूलने लगे हैं। इसे राष्ट्रीय स्तर पर पहचान और ख्याति दिलाने का प्रयास कर रही है शामगढ़ की वंदना शिवहरे। दो साल से वे इस पर शोध कर रही हैं। मांडने पर वे दो किताबें लिख चुकी हैं।
मांडने प्रथ्वी, प्रकृति एवं सृष्टि के उदय से अस्त तक की कथा कहते हैं। इनका सांस्कृतिक एवं धार्मिक महत्व है लेकिन वर्तमान में इसके महत्व को लोग भूलते जा रहे हैं। यह लोक कला लुप्त हो जाए। इसके लिए वंदना भरपूर प्रयास कर रही हैं। गांवों में तो यह घर के दरवाजों के आसपास दीवारों पर सफेद गेरु से बनी हुई दिखाई देती है लेकिन शहरों में दिखाई नहीं देती। दो साल में वंदना शिवहरे ने क्षेत्र के कई गांवों का भ्रमण कर इस कला को समझा। उन्होंने मांडने पर दो किताबें तैयार की हैं। इसमें करीब 1000 मांडने हैं। इनमें परंपरागत मांडनों के अलावा शहरी परिवेश के नए स्वरूप के मांडने भी हैं। वे मांडने पर दो वर्कशाप कर चुकी हैं। एक शामगढ़ दूसरी शिवपुरी में। शामगढ़ के सवितादेवी जायसवाल कॉलेज में इनके बनाए मांडने की प्रदर्शनी भी लगी थी।
ऊं श्री का मांडना
मयूर मांडना
ऐसे मिली प्रेरणा
वंदनाको इस कला को अागे बढ़ाने की प्रेरणा परिजन से मिली। वे इस पर काफी रिसर्च कर चुकी हैं। जल्दी ही शोधपत्र भी लिखने वाली हैं। उद्देश्य है मालवा क्षेत्र की इस कला को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना। उनका कहना है इसे नए कलेवर में नए रंगों के साथ फिर से लाया जाए तो शहरों में भी इसे सम्मान मिलेगा।
यह कहते हैं मांडने
वंदनाने बताया मांडना की परंपरा सनातन काल से है। सनातन धर्म और रहन-सहन में वैदिक एवं पौराणिक संस्कृति का बोलबाला रहा है। इसमें हर तथ्य का वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक महत्व रहा है। सृष्टि में हर जीव पंचतत्व से बना है। ये पंचतत्व शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक एवं सामाजिक दृष्टि से अपना महत्व रखते हैं। सूरज, चांद, मयूर, हाथी, स्वास्तिक, ओम, फूल पत्ती का मांडनों में खास उपयोग होता है। पुरातन काल में इन्हीं चित्रों के माध्यम से भगवान की पूजा-अर्चना की जाती थी। इसलिएखत्म हो रही कला- पहलेघर मिट्टी के रहते थे। आंगन एवं कमरों के फर्श पर गेरु या खड़ी से मांडते बनाते थे लेकिन अब पक्के मकान बनने लगे हैं। मांडना मांडने से पहले लोग घर की गोबर और पिली मिट्टी से लिपाई करते थे।
वंदना शिवहरे