सुख त्याग करने से मिलती है शांति : मुनि
गुना| जोव्यक्ति हमेशा प्रसन्न रहता है, वह जीवन में सुखी रहता है। प्रसन्नता इस तनाव भरे जीवन में बड़ा शस्त्र है। प्रसन्न रहने और हंसने में अंतर है। हंसना बुरा नहीं है, लेकिन दूसरों पर हंसना गलत है। कभी- कभी हंसना ठीक है लेकिन प्रसन्नता हमेशा रहना चाहिए। बाहरी वस्तुओं को जोड़- जोड़कर इंसान कभी सुखी नहीं बन सकता। जो ऐसा कर रहा है वह मूर्ख है। यह बात मुनि निर्वेग सागर महाराज ने कही। वह चौधरी मोहल्ला स्थित संतशाला में धर्मसभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि मोह- माया में आत्मज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता। अर्थ को जीवन का लक्ष्य बनाना अनर्थ है। एक सीमा तक ही परिग्रह ठीक रहता है, जो जरूरते पूरी करता रहे।