कहानी में विचारात्मक संवेदना जरूरी
हिंदी को मिले राष्ट्रभाषा का दर्जा
सिर्फभाषाई जादूगरी, चमत्कृत करने वाले शिल्प और दिलचस्प कथानक से महान कहानी नहीं बन सकती। कोई कथा साहित्य महान तब बनता है, जब उसके पीछे एक विचारात्मक संवेदना हो। कहानी के दूसरे तमाम तत्व जैसे भाषा, शिल्प आदि उसी संवेदना से संचालित होते हैं।
हिंदी दिवस के मौके पर प्रगतिशील लेखक संघ की विचार गोष्ठी में शनिवार देर शाम को यह बात संगठन के वरिष्ठ सदस्य पवित्र सलालपुरिया ने कही। इस गोष्ठी में कथा साहित्य के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा हुई। उन्होंने कहा कि कविता के मुकाबले गद्य साहित्य चाहे वह कहानी हो, उपन्यास या नाटक हों, यथार्थ से सीधे मुठभेड़ करता है। इसलिए उसका प्रभाव जनमानस पर गहरा पड़ता है। पर महान रचना तब पैदा होती है जब रचनाकार अपने वैचारिक संवेदना से यथार्थ को विश्लेषण करता है। उन्होंने कहा कि संवेदना के बिना कोई भी कथा रचना महज घटनाओं का सपाट विवरण बनकर रह जाएगी। श्री सलालपुरिया का कहना था कि कई कहानीकार ऐसे भी हुए हैं, जिन्होंने बिना किसी वैचारिक प्रतिबद्धता के रचनाएं लिखीं। वे अच्छी रचनाएं हो सकती हैं, लेकिन समाज के सापेक्ष में उनका कोई मूल्य नहीं होगा।वरिष्ठ सदस्य अतुल लुंबा का कहना था कि महान साहित्य अगर जनता तक पहुंचे तो उसका क्या फायदा। उन्होंने कहा कि लेखकों की यह भी जिम्मेदारी है कि उसका लिखा हुआ जनता तक पहुंचे भी। अगर लोग किताबें नहीं पढ़ रहे हैं तो इसकी वजहों की पड़ताल की जाना चाहिए। बैक यूनियन के साथ गिरधर शर्मा ने इसी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि पूर्व में कोर्स की हिंदी की किताबें हमें साहित्य से परिचित कराती थीं। बचपन में पढ़ी कई कहानियां आज तक हमें याद हैं।डॉ. दिनेश श्रीवास्तव का कहना था साहित्य में कहानी एक ऐसी विधा है, जिसमें रोचकता और संप्रेषणीयता सबसे ज्यादा है। यह लोगों को किताबों की ओर मोड़ने में अहम भूमिका निभा सकती है। पर इस समय अच्छी कहानियां बहुत कम पढ़ने में रही है। दिनेश औदिच्य ने कहा 60 और 70 के दशक में कहानी ने जबरदस्त ऊंचाइयां हासिल की थी, जो अब दिखाई नहीं देता।कार्यक्रम का संचालन कर रहे संगठन के सचिव सत्येंद्र रघुवंशी ने राजेंद्र यादव, कमलेश्वर, ज्ञानरंजन, मोहन राकेश, स्वयं प्रकाश का उदाहरण देते हुए कहा कि इन कथाकारों की कहानियों ने कथा साहित्य को प्रेमचंद युग से आगे बढ़ाया। इनकी कई कहानियां विचार