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दिल की तंदुरुस्ती का पुख्ता बंदोबस्त

6 वर्ष पहले
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हिंदुस्तान की क्वालिटी ऑफ हेल्थकेयर है और डॉक्टर्स की जो क्वालिटी है, वह सर्वोत्म है। बहुत बढ़िया है। हम चिकित्सा के क्षेत्र में दुनिया की अत्याधुनिक और बहुत जटिल किस्म की सर्जरी कर लेते हैं। फिर दूसरे देशों, खासतौर पर प्रगत देशों की तुलना में लागत 10 गुना कम है। अब इसमें हमारे सामने चुनौती यह है कि यह अत्याधुनिक सुविधा हर हिंदुस्तानी को कैसे उपलब्ध कराई जाए। यह कोई दुर्भाग्य की बात नहीं है। इसे चेलैंज के रूप में लेना चाहिए। हमने यानी मेडिकल कम्युनिटी ने आपस में बहुत चर्चा करके सरकार को इसका ब्ल्यू प्रिंट दिया है। ब्ल्यू प्रिंट फॉर यूनिवर्सल हैल्थ। यानी कैसे हर हिंदुस्तानी को मूलभूत चिकित्सा सुविधाएं मिले। जो उसका हक है। हमारी कमेटी ने जो सुझाव दिया है, वह यह है कि अभी जो राष्ट्रीय बीमा योजना है उसने गरीबी रेखा से नीचे के लोगों को 30 हजार रुपए का कवर दिया जाता है। यानी 30 हजार तक के इलाज का खर्च इसके तहत वहन किया जा सकता है। हमने सुझाव दिया है कि इस राशि को बढ़ाकर 60 हजार कर दिया जाए। इससे यह होगा कि सेकंडरी हैल्थ केयर की सारी सुविधाएं इससे जुटाई जा सकती हैं। यानी बीमारियों का इलाज, छोटे ऑपरेशन। यह सब निजी अस्पताल में भी हो सकेंगे। यह सुविधा गरीबी रेखा से नीचे रह रहे लोगों को मिल जाएगी।

इसके अलावा यदि हम हर परिवार को 2 लाख रुपए प्रतिवर्ष का अतिरिक्त फ्लोट दें। अब ऐसा तो नहीं होता कि सब एक साथ बीमार पड़ जाएं, इसलिए इसका बोझ इतना ज्यादा नहीं होगा। यदि सात प्रमुख सर्जरी के लिए दो लाख का कवर होगा तो बहुत फायदा होगा। जैसे हार्ट सर्जरी हो गई, ब्रेन सर्जरी हो गई या लंग सर्जरी हो। हम चाहते हैं कि निजी अस्पताल यह प्रतिबद्धता जता दें कि चाहे आज की तारीख में इन सर्जरी में 3 लाख का खर्च आता हो पर हम ये सात सर्जरी 2 लाख में कर देंगे। इससे आम लोगों को बहुत राहत मिल जाएगी। यह तो हम तत्काल कर सकते हैं। यह भी संभावना है कि इस बार के केंद्रीय बजट में इस पर कोई चर्चा हो और कोई घोषणा कर दी जाए। हमने प्रधानमंत्री मोदीजी से भी चर्चा की कि हम इस तरह की व्यवस्था चाहते हैं और सरकार भी चाहती है िक लोगों तक स्वास्थ्य रक्षा की सुविधाएं पहुंचे। जब दोनों ओर से सोच एक जैसी हो तो मेरी उम्मीद बढ़ गई है कि कुछ होगा।

दूसरी अच्छी बात यह है कि इलाज का चलन उल्टा हो गया। जब मैं अमेरिका में था तो लोग भारत से वहां इलाज कराने आया करते थे। अब अमेरिका से लोग यहां इलाज कराने आते हैं। बहुत से मरीज मेरे पास आते हैं। यह मेरा अनुभव है। साफ है कि भारतीय मेडिकल क्षेत्र की कायापलट हो गया है। इसीलिए मेडिकल टूरिज्म भी बढ़ रहा है, क्योंकि दुनिया में लोगों को यह अहसास हो रहा है कि भारत में यह क्षमता है, स्किल का वह लेवल है। अब इसी को आगे बढ़ाना है। नकारात्मकता दूर करनी होगी। भारत में अपराध ज्यादा है। सुरक्षा उतनी नहीं है। वीज़ा में अड़चनें आती है। यह सब गलतफहमियां हमें दूर करनी होंगी। इन्हें लेकर हम ही बहुत शोर मचा देते हैं। हमने तो इतना किया है कि हम हमारे पेशेंट को एयरपोर्ट पर ही रिसीव करते हैं और इलाज के बाद उसे एयरपोर्ट तक सुरक्षित छोड़कर आते हैं।

अब मेरे क्षेत्र की, कार्डियोवैस्कूलर यानी दिल-धमनियों संबंधी रोगों की चर्चा करें तो कई सकारात्मक बातें हुई हैं। हम बचाव से शुरू करते हैं। सबसे पहले दिल पर से लोड कम करना होगा, क्योंकि यह नहीं किया तो हिंदुस्तान में इतना पैसा तो नहीं है कि हर व्यक्ति को सर्जरी मुहैया कराई जा सके। इस दिशा में हमने बार-बार प्रचार किया है कि कैसे हम चुस्त-दुरुस्त रहें। तीन बिल्कुल आसान-से गुर हैं। पहला, खान-पान पर लगाम रखें। तली हुई और मीठी चीजें बहुत कम, सब्जियां फल ज्यादा। दूसरा, एक्ज़रसाइज। रोज 45 मिनट इसे दीजिए। चाहे आप 30 मिनट दौड़-भाग करें और 15-20 मिनट योगासन करें। हफ्ते में चार दिन भी यह किया तो आप फिट रहेंगे। वजन काबू में रखना है, जो आदर्श वजन है उससे 10 फीसदी ऊपर-नीचे के दायरे में बने रहना है। ये बातें सामान्य रूप से मालूम है पर मैं इसलिए दोहरा रहा हूं कि बार-बार कहने से ही यह हमारी जीवनशैली का हिस्सा बनेगा। अब प्रचार का ही नतीजा है कि जागरूकता बढ़ गई है। कोई अपराध की खबर है तो हो सकता है कि उसे नजरअंदाज कर दिया जाए, लेकिन अगर दिल के रोग से बचने की कोई बात हो तो व्यक्ति अपने-आप एक बार तो जरूर पढ़ लेता है। कई वर्षों से हम प्रचार में लगे हैं और लोगों में काफी हद तक जागृति गई है।

अब इसके आगे यह है कि जिसको दिल का रोग हो जाए तो उसका जल्द से जल्द और कम लागत में इलाज हो जाए। हार्ट अटैक के पहले उसका इलाज करना है। कई तरह के स्टेंट आए हैं। स्टेंट के बंद होेने का खतरा कम हुआ है। बहुत 20 फीसदी बंद हो जाते थे, अब सिर्फ 10 फीसदी में यह जोखिम है। बायपास में पहले हम हार्ट-लंग मशीन पर दिल को रोककर ऑपरेशन करते थे, अब धड़कते दिल पर बायपास करते हैं। तकलीफ आधी रह गई और लागत भी कम हो गई। फिर छोटे-छोटे छेद के जरिये बायपास करने लगे ताकि छाती खोलनी पड़े। अब रोबोट का इस्तेमाल शुरू हो गया। इसमें पांच मिलीमीटर के छेद से बायपास हो जाती है।

सबसे बड़ी बात यह हुई है कि जिन लोगों का हार्ट कमजोर हो जाता था तो हम उनके लिए कुछ नहीं कर पाते थे। अब स्टेम सेल के जरिये उनका इलाज शुरू कर दिया है। उसके बहुत अच्छे नतीजे आए हैं। यह लोगों के लिए नई उम्मीद है। इसके इलाज से 80 फीसदी रोगियों को बहुत फायदा हुआ है। इसमें रोगी के बोन मेरो से एक विशेष उपकरण से स्टेम सेल अलग करके उसे दिल में इंजेक्ट किए जाते हैं। इसके लिए हार्ट ओपन करने की जरूरत नहीं है। यह कैथेड्रल की मदद से ही हो जाता है। ट्रांसप्लाट और आर्टिफिशियल डिवाइस का इस्तेमाल भी आम हो गया है। इन सारी तकनीकों से हृदय रोगियों के लिए नई उम्मीद जागी है।

एक लेडी का फोन आया कि डॉक्टरों ने कहा है िक मेरे पति की मौत हो गई है पर मुझे विश्वास नहीं है कि वे चले गए हैं। मैं नहीं मानूंगी जब तक आप नहीं देख लेते। मैं भागकर गया हॉस्पिटल। मैंने देखा उसका ब्लड प्रेशर 40-50 हो गया था। इसमें हम समझते हैं कि आदमी बच नहीं सकता। मैंने एक डिवाइस की मदद से आहिस्ते-आहिस्ते ब्ल्ड प्रेशर बढ़ाया और फिर उसे ऑपरेशन थिएटर में ले गया। कठिन परिस्थितियों में उसका ऑपरेशन किया और वह बच गया। मुझे जीवन का सबसे बड़ा सबक मिला कि कभी भी आप हाथ खड़े मत करो। जब तक भगवान डिसाइड करें, हमें हाथ खड़े नहीं करना चाहिए। यह रवैया रहेगा तो कई लोगों की जान बच सकती है। एक बार एक बौने कद का 40-45 साल का रोगी लाया गया। उसका कद साढ़े तीन-चार फीट का था। उसे हार्ट अटैक आए थे। चार अस्पतालों ने सर्जरी से इनकार दिया। कहा कि वह इतना छोटा था कि ऑपरेशन नहीं हो सकता। मेरे पास लाए तो वह बेहोश हो गया। मैंने उसका ऑपरेशन कर दिया। छह दिन बाद वह घर चला गया। info@medanta.org

(जैसाउन्होंने आनंद देशमुख को बताया।)

डॉ. नरेश त्रेहान

एमडी चैयरमैन मेदांता-द मेडिसिटी