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यदि भाजपा दिल्ली हार जाए तो सबसे बड़ा फायदा मोदी को होगा!
सफलता शेरकी तरह दिखती है, किन्तु है भेड़ों की तरह। उतनी भोली नहीं। बस, चलने में वैसी। सफल के पीछे-पीछे। सिर झुकाए। चलती चली जाती हैं। जैसे कि वे नरेंद्र मोदी की भाजपा के पीछे-पीछे चल रही हैं। कई दिनों से।
विफलता शुतुरमुर्ग की तरह है। ऑस्ट्रिच। उतनी ही भीमकाय। लेकिन वैसे ही खतरे को देखकर स्वयं भी आंखें बंद कर लेना। झूठी आशा में कि मैं नहीं देखूंगा, तो खतरा ही टल जाएगा। अपने आस-पास उपस्थित को भी रेत में मुंह गड़ा देने को प्रेरित करने वाला। जैसे कि कई शुतुरमुर्ग लोकसभा चुनाव से राहुल गांधी की कांग्रेस के साथ-साथ चल रहे हैं।
कभी-सफल-कभी-विफल तीसरी श्रेणी है। गाय जैसी। उतनी सीधी नहीं। किन्तु वैसी हां-ना की स्थिति में। कभी पूज्य बना दी गई। कभी भटकने को छोड़ दी गई। सींग मारने वाली हुई तो कभी हड़कम्प भी मचा दिया। महत्व मिले, मिले, प्रासंिगक हमेशा। सड़कों पर अड़ गई तो क्या भीड़, क्या वाहन और क्या कानून के रखवाले! अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी इसी श्रेणी में हैं।
यह दिल्ली चुनाव का दृश्य है। सफल को विफल करने के संघर्ष का परिदृश्य। कभी-सफल-कभी-विफल के पुन: सफल होने की छटपटाहट का।
भारतीय राष्ट्रीय इतिहास में संभवत: पहले कभी किसी एक राज्य के चुनाव को -वो भी इतने छोटे राज्य को, जो कि पूर्ण राज्य है भी नहीं- लेकर इतना हल्ला नहीं हुआ। वास्तव में हल्ला ही अधिक है। देश भर को यह बताया जा रहा है कि यह चुनाव नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता पर जनमत संग्रह है।
जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है। किन्तु बना ऐसा ही दिया गया है। उन्होंने भी मान लिया है।
प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने तीन मोर्चों पर प्रभावी सफलता प्राप्त की है। सबसे पहली है : विदेश। नीति हो या गति। दूसरा मोर्चा चुनावों का है। और तीसरी सफलता है : चर्चा। चाय पर चर्चा तो अमेरिकी राष्ट्रपति तक से कहलवा दी! जिस जगह एक प्रतिशत भी टॉकिंग पाॅइन्ट बनने की संभावना मोदी देखते हैं - उनका पूरा ध्यान वहां 99 प्रतिशत जोेड़ने में लग जाता है।
दिल्ली चुनाव में उनकी रुचि बढ़ती गई। बढ़ा दी गई। इतने राष्ट्रीय नेता, इतने केंद्रीय मंत्री, इतने सांसद, इतने एक्टिविस्ट, इतने सामाजिक कार्यकर्ता, दानदाता इस चुनाव में दिन-रात लगे हुए हैं। चुनाव में चर्चित तो कॉमन मैन है। किन्तु वह आम आदमी पार्टी जैसा कॉमन नहीं है।
कहते हैं, किसी का नकारात्मक अतीत पता लगाना हो तो उसे राजनीति में उतार दो। सब सामने जाएगा। यही हुआ। पिछली बार केजरीवाल कैसे हर जिम्मेदारी से भाग खड़े होते हैं - यह स्वत: सामने आया था। इन्कम टैक्स अफसर बने। एक केस पकड़ा। एक भ्रष्टाचार खोजा। फिर अपना आंदोलन, साथी, कांग्रेस का समर्थन। \\\"भगोड़े\\\' कहते हैं मुझे ये सब - कहकर पहले ही माफ़ी मांगकर राजनीतिक परिपक्व होने का अब परिचय दे रहे केजरीवाल सब झेल चुके हैं। 10 बेडरूम के मकान का तब विवाद। काले धन या झूठे डोनेशन का अब विवाद।
इसी तरह अतीत की भूलें किरण बेदी की भी सामने लाईं गईं। कैसे बेटी को दिल्ली में मेडिकल सीट मिजोरम कोटे से दिलवाई थी। कैसे क्रेन बेदी की झूठी छवि कमाई थी। इंदिरा गांधी की कार का चालान तो \\\"बेचारे\\\' सब-इन्सपेक्टर निर्मल सिंह ने बनाया था - श्रेय वे ले गईं। और भी क्या-क्या।
स्वयं नरेंद्र मोदी हर चुनाव में किसी किसी अतीत से उलझते-उलझाते दिखे।
यू आर नॉट रिच इनफ टु बाय बैक योर पास्ट। सचमुच।
किन्तु इस बार के दिल्ली चुनाव में पास्ट नहीं, प्रेजेंट की बात हो रही है। और उसका ताल्लुक दिल्ली जीतने से है। बदली हुई दिल्ली।
कितनी बदल गई है वोटर की आवश्यकताएं, इस पर सबसे सहज और सरल टिप्पणी वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता ने की है। उन्होंने बताया कि केजरीवाल के एक होर्डिंग पर वादा लिखा मिला : डिग्री/आमदनी/वाई-फाई!
बिजली के बिल भरने से राजनीति शुरू करने वाले नेता ने किस तरह वाई-फाई देना एक प्रमुख चुनावी वादा बना लिया। या कि इसके मूल में सोशल मीडिया की दिल्ली चुनाव को लेकर दीवानगी भी हो सकती है। कांग्रेस को छोड़ दें तो भाजपा और आप दोनों ने जितनी तैयारी 9000 पोलिंग बूथ के लिए की है - संभवत: उतनी ही बड़ी तैयारी सोशल मीडिया पर चर्चा पैदा करने के लिए भी की है।
फिर सर्वे हैं। उतार-चढ़ाव के बावज़ूद केजरीवाल सर्वे में आगे जाते दिखलाई पड़ रहे हैं। यही भाजपा की सबसे बड़ी चिंता है।
तो क्या भाजपा दिल्ली हार रही है? प्रधानमंत्री मोदी के स्वयं लग जाने के बाद भी? कांग्रेस पिछले चुनाव में 8 सीटें जीती थी। उसे 25 प्रतिशत वोट मिले थे। अब बताया जा रहा है कि 0 से 6 तक सीटें पा सकती है। तो जो वो कांग्रेस का वोट है - मुस्लिम पिछड़ी बस्तियांे का - वह भाजपा को हराएगा। यदि आप को मिल गया, तो। कहते हैं, कांग्रेस के खोते जा रहे हर 10 वोट में से 7 आप को जाने की संभावना है। बिजली, पानी, झुग्गी और छोटे-छोटे भ्रष्टाचार को लेकर लड़े गए इस स्थानीय चुनाव की राष्ट्रीय प्रसिद्धि का कारण मोदी हैं। कि आप। किन्तु जिन सर्वे को लोकसभा चुनाव में मुस्कुराकर, सकुचाकर पुचकार रहे थे भाजपा नेता; उन्हीं को वे ललकार रहे हैं। धिक्कार रहे हैं। स्वयं मोदी ने तो सर्वे को, \\\"बाज़ारू\\\' घोषित कर दिया!
पिछली बार के दिल्ली चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी भाजपा लोकसभा चुनावों में भारी जीत के दौरान 70 में से 60 विधानसभा सीटों पर बढ़त लाई थी। आज कहां उलझ गई? मिशन 60+ का क्या हुआ?
संभवत: यह भेड़ों को रोकने के लिए लगाया जा रहा ज़ोरदार हांका है। कि आगे मत जाओ! या कि जाओ तो कुछ दिशा बदल लो। खतरा है। राह नहीं है। या फिर कभी तो भेड़ों को कोई कहे कि इतना भी क्या सिर झुकाकर चलना? हमेशा?
शुतुरमुर्ग तो आंखें बंद ही रखेंगे। उनके आस-पास रहना ही नहीं। मुश्किल है शुतुरमुर्गों के साथ को छोड़ना। किन्तु तभी अांखें खुलेंगी।
गाय को चारा देने पर, बाड़ा देने पर वह लौटती है। कभी चिंहुक कर वार भी कर सकती है। पहलेे कहते थे, दुधारू गाय की मार भी प्यारी। पता नहीं।
हां, यदि भाजपा दिल्ली हार जाती है तो सबसे अधिक फ़ायदा मोदी को होगा। वे अगली सफलता के लिए दिन-रात भिड़ जाएंगे। बिहार। या कि उससे भी पहले बजट। बहुत हो गया विदेश। चुनाव भी कई हो चुके। चर्चा की भी अति हो गई।
चर्चा अति हो जाए तो अकर्मण्य चर्चाओं में बदल जाती है। मोदी काम करना चाहते हैं। वे सबसे बड़े शो मैन हैं भारतीय राजनीित के। इसलिए उनके हर काम को बड़े भारी \\\"शाहकार\\\' की तरह पेश किया जाता है। ऐसी शख्सियत हार सहन नहीं कर पातीं। बड़ी, कई गुना बड़ी जीत के लिए नई शुरुआत कर देती है।
सफल होने के अपने लाभ हंै। जो किनारे बैठे होते हैं - वे सफल के साथ स्वत: हो जाते हैं। सफल के अपने नुक्सान हैं। ईर्ष्या का केन्द्र बन जाते हैं।
निर्दोष सफल को दोषी मान लिया जाता है। दोषी विफल को निर्दोष समझा जाता है। इसलिए सफल को सजग, सतर्क रहना पड़ता है। दिल्ली चुनाव में इसे साक्षात देखा जा सकता है।
काश,मोदी की पार्टी हार जाए। तो कुछ बड़े काम देश के लिए हो जाएंगे। नाम मोदी का होगा ही। है ही। नेताओं या कि मतदाताओं में ऐसी सोच असंभव है। किन्तु सोचना ही होगा। हर विफलता एक बड़ी, अनसोची सफलता की जननी है।
-(लेखक दैनिक भास्कर के ग्रुप एिडटर हैं।)
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