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147 किसान तीन हजार बोरा गेहूं का बीज खुद तैयार करेंगे
सहकारिता में नवाचार के ये प्रयोग
बीज खरीदने ग्रेडिंग की झंझट खत्म
शैलेषजैन| हरदा
छिदगांवतमोली, हरदा जिले का ऐसा पहला गांव होगा, जहां के 147 किसान तीन हजार बोरा गेहूं का बीज खुद तैयार करेंगे। वे खुद की खेती की जरूरत पूरी करेंगे और दूसरे गांव के किसानों को बीज बेच भी सकेंगे। बीज की गुणवत्ता अच्छी और लागत कम होगी। बाजार से बीज खरीदने ग्रेडिंग की झंझट खत्म। यह योजना गांव की सहकारिता से साकार हाेने वाली है। नाबार्ड के वित्तीय सहयोग से सीड ग्रेडिंग प्लांट गांव में मार्च तक लग जाएगा।
जिला मुख्यालय से 13 किलोमीटर दूर छिदगांव तमोली की ग्रामीण विकास सहकारी साख सोसाइटी का काम अनूठा और प्रेरणादायक है। सोसाइटी बने डेढ़ साल ही हुए हैं। अपने नवाचार के प्रयोगों के कारण चर्चा में है। इसका कामकाज देखने राज्य योजना आयोग के उपाध्यक्ष बाबूलाल जैन खुद चुके हैं। उनके शब्द थे, यह सोसाइटी सहकारिता में मील का पत्थर साबित होगी।
गेहूं के बीज के ग्रेडिंग के प्रस्ताव देने वाले आयोग के प्रमुख सलाहकार डॉ. राजेंद्र मिश्रा मंगेश त्यागी थे। वे कहते हैं, जल्दी ही छिदगांव तमोली सोसाइटी में महज सात लाख रुपए की लागत से शुरू हो रहे बीज ग्रेडिंग प्लांट का काम देखने आएंगे।
सोसाइटी अध्यक्ष अशोक गुर्जर ने बताया, 2013 में गांव के 21 किसानों ने 100-100 रुपए जमाकर ग्रामीण विकास सहकारी साख समिति बनाई थी। इसका उद्देश्य ग्रामीणों में बचत को बढ़ावा देना और जीवन स्तर को ऊंचा उठाना बना। आज इसमें 147 सदस्य जुड़ चुके हैं। इस सोसाइटी का प्रयोग देखने दूसरे जिले की सोसाइटी के संचालक रहे हैं।
{ इस साेसाइटी ने राज्य शासन से अनुदान लिए बिना 25 लाख रुपए का बिजनेस ट्रांजेक्शन किया।
{ यह पहला गांव है जहां सोसाइटी ने पूरे किसानों के खेत की मिट्टी के जरूरी 10 तत्वों की जांच करवाई। अधिकतर किसान सदस्य ऐसे हैं जिन्होंने गेहूं की फसल कटवाई के बाद नरवाई नहीं जलाई। उनके खेत की मिट्टी में संतुलित जीवांश कार्बन पाया गया।
{ सोसाइटी ने गांव के किसानों को यूरिया संकट से मुक्त रखा। गांव के किसान राजेंद्र सिंह राजपूत कहते हैं, इस सीजन में सोसाइटी ने चार हजार बोरी यूरिया बांटी। सोसायटी इफ्को की डीलर भी है। यह प्रयोग देखने छिंदवाड़ा जिले की पाला चौरई आदिम जाति सेवा सहकारी समिति का दल आया।
{ गेहूं के बीज की ग्रेडिंग करने से किसानों को बाजार से मिलने वाला बारीक कटे-फटे दाने से निजात मिलेगी। वे 2200 से 3500 रुपए प्रति क्विंटल के भाव से बीज खरीदते थे। किसान रामजीवन गुर्जर कहते हैं, 80 रुपए ग्रेडिंग के और 50 रुपए आने-जाने का खर्च लगता था।
पूरी सोसाइटी कम्प्यूटराइज्ड है। एक अप्रैल से आंध्रप्रदेश से बुलवाया जा रहा मल्टीपर्पस साफ्टवेयर भी लग जाएगा। इससे सोसाइटी के हिसाब-किताब में पारदर्शिता रहेगी। हर सदस्य का पूरा लेनदेन पासबुक में प्रिंट होकर निकलेगा। सहकारिता का अगला प्रयोग वृक्ष दर साख सीमा योजना है। यानी किसान सदस्यों को आम के वृक्ष पर ऋण दिया जाएगा। कुछ दिनों बाद योजना में दूसरे वृक्ष भी जुड़ेंगे। अभी तक सहकारिता में ऐसा प्रयोग दूसरी जगह नहीं हुआ।