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स्वंतत्रता संग्राम सैनानी को मौत बाद मिला इंसाफ

7 वर्ष पहले
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नगरके स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व. राजाराम चौरसिया को उनकी मौत के बाद कोर्ट से इंसाफ मिल पाया है। स्व. राजाराम चौरसिया ने किशोरावस्था से ही देश की आजादी की लड़ाई में भाग लिया था। लेकिन दुर्भाग्यवश उन्हें अपने जीते जी सम्मान निधि (पेंशन) नसीब नहीं हुई। लेकिन उनकी मौत के बाद जबलपुर हाईकोर्ट ने इंसाफ किया है। हाईकोर्ट ने 7 दिसंबर को दिए अपने एक फैसले में राज्य सरकार से कहा है कि स्व. श्री चौरसिया के वारिसों को दो माह के भीतर उनकी संपूर्ण सुरक्षा निधि ब्याज सहित दी जाए। स्व. चौरसिया के दूसरे बेटे एडवोकेट मुरारी चौरसिया ने बताया कि उन्होंने वर्ष 2002 में अपने पिता की रुकी हुई सम्मान निधि एवं इंसाफ के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उनके पिता राजाराम चौरसिया को 15 अगस्त 1972 को देश के तात्कालीन राष्ट्रपति एवं उस समय के मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा ने सिर्फ ताम्रपत्र से सम्मानित किया था बल्कि भरण पोषण के लिए पेंशन भी स्वीकृत की थी। वकील श्री चौरसिया ने आरोपित किया है कि उस समय के क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों एवं नौकरशाहों की घोर लापरवाही के कारण ही उन्हें न्याय के लिए हाईकोर्ट की शरण में जाना पड़ा। हाईकोर्ट के न्यायाधीश संजय यादव की एकल पीठ के समक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता आरके समैया एवं शैलेन्द्र समैया ने यह दलील पेश की थी कि सोलह वर्ष की आयु में स्व. राजाराम चौरसिया को अंग्रेजी हुकूमत ने सात माह तक जेल में रखा था। उसके बाद अच्छी चाल चलन को देखते हुए उन्हें रिहा कर दिया गया था। जबकि प्रशासनिक तौर पर यह आरोपित किया गया था कि राजाराम चौरसिया ने अंग्रेजों के सामने रिहाई के लिए माफीनामा प्रस्तुत किया था। जबकि तत्कालीन दस्तावेजों में यह कहीं उल्लेख नहीं था कि हटा के इस सेनानी ने अंग्रेजों से किसी भी तरह की माफी मांगी थी। हाईकोर्ट ने प्रस्तुत दलीलों से सहमत होकर चौरसिया के पक्ष में फैसला दिया है।

स्व. राजाराम चौरसिया।