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गुफाओं में बने शैलचित्र बन सकते विश्व धरोहर
बुंदेलखंडकी धरा अपने गर्भ में आज भी अनेक धरोहर को छिपा रखे हैं, कई धरोहर तो ऐसी हैं कि यदि उन्हें उचित संरक्षण मिल जाए। उस स्थान को आवागमन के मार्ग से जोड़ दिया जाए तो ये विश्व धरोहर के रूप में उभरेगीं। जगह जगह पत्थरों पर बने शैल चित्र अब विलुप्त होने की कगार पर है। कहीं उन पर कई और मिट्टी जम रही है, तो कहीं ये धरोहर खनिज माफियों के द्वारा नष्ट की जा रही है।
रानी दुर्गावती विश्व विद्यालय जबलपुर के शोधार्थी छात्र संतोष तिवारी ने अपने सर्वेक्षण के दौरान बटियागढ़ तहसील में जूड़ी नदी के किनारे एक पहाड़ी की एक टूटी फूटी चट्टान पर 10 से 15 शैल चित्रों को देखा है। इन चित्रों में हिरण, घोड़े, जंगली सूअर, चूहा एवं शिकार करते मानव के चित्र बने हुए है। ये चित्र गेरूआं रंग से बने हुए हैं। संभावना व्यक्त की जा रही है कि ये चित्र हजारों साल पुराने हैं।
इसी तरह हटा विकासखंड में सिलापरी गांव के जंगल में पत्थर की गुफाओ में हजारों साल पहले बनाए शैलचित्र आज भी स्पष्ट दिखाई देते हैं। आवागमन के साधन होने एवं क्षेत्र के पिछड़े होने के कारण इन ऐतिहासिक धरोहर को आज भी उचित स्थान नहीं मिल पाया है। जबकि इससे मिलती जुलती धरोहर जो राजधानी या शहरों के पास है, उन्हें आज विश्व धरोहर के रूप में जगह मिल गई। गांव के लोग इन चित्रों को रक्त की पुतरियां के नाम से जानते हैं। गांव वालांे को मनना है कि ये चित्र खनिज रंगों से बनाएं गए है, लाल रंग से उभरे इन चित्रों में विभिन्न आकृतियां है। इन चित्रों को गुफा में पत्थर पर ऊपर की और बनाया गया है। जिन स्थान और गुफा में ये चित्र है। वहां तक पहुंचना सहज और सरल भी नहीं है। दुर्गम रास्तों से होकर यहां तक पहंुच सकते हैं। गुफा के नीचे भारी खाई है। सारी पर्वत माला पत्थरों की है। यहां किसी के नहीं पहुंचने के कारण यहां अब बंदरों का डेरा रहता है। गुफा पर बने शैलचित्रों में अधिकांशतः जंगली पशुओं जिसमें जंगली भैंसा, हिरन, खच्चर, लोमड़ी, सुअर, कुत्ता, गाय आदि के है। कुछ पुतरा पुतरियों के चित्र है, तो कुछ चित्र अस्पष्ट हैं। इन चित्रो को कौन से रंग से बनया गया यह स्पष्ट नहीं ंहै। हजारों साल बाद भी ये चित्र अपनी पहचान बनाए हुए हैं।
उल्लेखदमोह दीपक ग्रंथ में भी
काॅलेजके पूर्व प्राचार्य डाॅ. श्यामसुंदर दुबे ने बताया कि ये चित्र चित्रबीथि प्रागैतिहासिक है। इन चित्रों को